इस्लाम में ग़ुलामी और कनीज़ी का रिवाज : मौजूदा दौर में

इस्लाम में ग़ुलामी और कनीज़ी का रिवाज : मौजूदा दौर में

सवाल : इस्लाम में कनीज़ों / ग़ुलामों को रखने की इजाज़त क्यों थी? क्या यह इन्सानियत के ख़िलाफ़ नहीं? आजकल भी बहुत जगहों पर इन्सानों को ख़रीदा और बेचा जाता है, क्या यह इजाज़त अब भी मौजूद है? क्या हम इस दौर में भी ग़ुलाम और कनीज़ रख सकते हैं?

जवाब : बेशक इस्लाम के अहकामात मुकम्मल हैं लेकिन बहुत जगहों पर इस्लाम ने उसूल बनाए हैं, इन उसूलों को हम ने हर ज़माने में लागू करना है, मिसाल के तौर पर मौला अली (अस) पर किसी नादान ने एतराज़ किया कि रसूल अल्लाह (सअ) ने तो दाढ़ी को ख़िज़ाब करने का हुक्म दिया था और आप ख़िज़ाब नहीं करते। तो मौला अली (अस) ने उसको जवाब दिया था कि चूंकि उस वक़्त मुसलमान कम थे और उनको यहूदियों से जुदा दिखने के लिए यह हुक्म दिया था क्योंकि यहूदी अपनी दाढ़ी नहीं रंगते थे। और लोगों की कमी की वजह से मुसलमानों को ख़िज़ाब का हुक्म हुआ ताकि जवान लगें और दुश्मनों पर हैबत तारी हो। लेकिन अब यह बात नहीं है तो मौला अली(अस) ख़िज़ाब नहीं लगाते थे।

तो हमें इस विषय की पहचान आनी चाहिए। शरियत उसूल बताती है, विषय की पहचान हर ज़माने के हिसाब से होगी। शरियत के इन्हीं उसूलों में से एक अदालत है, उस ज़माने में ग़ुलामी और कनीज़ी को क़ुबूल किया जाता था तो इस्लाम ने शुरू में इस को बाक़ी रखा लेकिन ग़ुलामों के हक़ूक़ ऐसे बयान किये कि इन्सानों जैसा व्यवहार हो। लेकिन जब ग़ुलामी कनीज़ी अदालत के ख़िलाफ़ समझी जाने लगी तो ख़ुद बख़ुद यह हुक्म बेकार हुआ, और इसको बेकार भी शरियत ने अपने उसूल “अदालत” के ज़रिए किया।

पुराने ज़माने में जंगों की वजह से जंगी क़ैदी बड़ी संख्या में बनते थे। ग़ुलामों और कनीज़ों के वुजूद को क़ुबूलियत हासिल थी, इस दौर में दुनिया के हर आईन और दीन में इसकी इजाज़त थी क्योंकि जंग से तबाह हाल क़ैदी समाज में अराजकता फैला सकते थे तो ग़ुलामों की सूरत में उन ग़ुलामों की जीविका मिल जाती थी। इस्लाम ने इस इजाज़त को बाक़ी रखा लेकिन इस से मुक़ाबले के लिए जो उसूल बनाए वह यह हैं :

1: ग़ुलामों के साथ अच्छा व्यवहार करने का हुक्म हुआ, जो ख़ुद खाओ वह उनको भी खिलाया जाए। उनको अच्छा पहनाने का हुक्म हुआ और आइम्मा (अस) अपने दस्तरख़्वान पर ग़ुलामों को भी बिठाया करते थे, और कई लोग एतराज़ भी करते थे।

2: उनको अाज़ाद करने को प्राथमिकता दी गई। इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अस) के बारे में मिलता है कि वह बहुत ग़ुलाम और कनीज़ ख़रीद कर आज़ाद किया करते थे। हर साल रमज़ान में ग़ुलामों को ख़रीदा करते थे, उनकी दीनी लिहाज़ से तरबियत(प्रशिक्षित) करते थे और अगले रमज़ान उनको आज़ाद करते थे। इमाम (अस) की तरबियत की वजह से यह ग़ुलाम बेहतरीन इन्सान बन जाते थे।

3: कनीज़ ख़रीद कर उन से मिलाप करने के बजाए उनसे निकाह करने के सलाह दे दी गई। कई आइम्मा(अस) की मां कनीज़ें थीं जिन का ताल्लुक़ दुनिया के अलग अलग इलाकों से था। आइम्मा (अस) ने अपनी कनीज़ों से ही शादियां की और अपने शियों को अमल करके प्रोत्साहित किया कि वह इस अच्छे काम में ज़रूर हिस्सा लें। इमाम ज़ैनुल अाबिदीन (अस) ने जब अपनी कनीज़ से निकाह किया तो उस वक़्त के अमवी ख़लीफ़ा ने आप को ख़त लिख कर अपनी तरफ़ से ग़ैरत दिलाने की कोशिश की कि आप इतने उच्च ख़ानदान से हैं, आप के लिए क़ुरैश के ख़ानदान से बेहतरीन रिश्ते मौजूद थे लेकिन फिर भी आप (अस) ने एक कनीज़ से शादी की? इसके जवाब में इमाम (अस) ने लिखा कि इस्लाम इन घिसे पिटे ख़यालात को मिटाने आया है, निकाह को इस्लाम में पसन्द किया गया है और अगर यह काम किया जाए तो इसमें कोई एतराज़ नहीं किया जा सकता।

4: अक्सर हरम बनाने का रिवाज ग़ैर शियों में था, शिया अपने इमाम की तरबियत में इन चीज़ों से दूर थे।
[ हरम किसी एक पुरुष की अनेक स्त्रियों के रहने के उस स्थान को कहते हैं जहाँ अन्य मर्दों का जाना वर्जित होता है।
हरम शब्द की अरबी शब्द हरम (حرم) से बना है जिसका अर्थ “वर्जित क्षेत्र” या “पवित्र, पावन”। यह शब्द अरबी के हरीम (حريم) और हराम (حرام) से सम्बन्धित है जिनका क्रमशः अर्थ होता है “पवित्र या अलंघनीय स्थान;परिवार की औरतें” या “वर्जित;पावन”]

5: ग़ुलामों की इज़्ज़ते नफ़्स को चोट देने से मना किया गया। मिसाल के तौर पर इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अस) के एक सहाबी ने अपने ग़ुलाम को गाली दी तो इमाम (अस) उसे से सख़्त नाराज़ हुए।

अब चूंकि जंगी क़ैदियों को ग़ुलाम बनाने का रिवाज नहीं रहा बल्कि आलमी-मुआहदों (Worldwide Agreement) जैसे “जेनेवा कन्वेंशन” के अन्तर्गत इसको क़ानूनी हैसियत नहीं है तो अब यह अहकामात भी ख़त्म हो चुके हैं। अगर अब भी कहीं पर इन्सानों को ख़रीदा और बेचा जाता है तो यह जाएज़ नहीं है।

बहुत से शरई अहकामात का ताल्लुक़ ज़माने के ज़रूरतों से होता है। इस की बुराई के बावजूद अगर इस्लाम ने इसकी इजाज़त दी तो ज़माने की हालत की वजह से, अब चूंकि ऐसा नहीं है तो इस्लाम में यह इजाज़त ख़त्म हो गई। याद रहे कि यह सिर्फ़ इजाज़त थी, इजाज़त और हुक्म में फ़र्क़ है।

फ़र्ज़ करें कि एक बच्चा अपने बाप से आइसक्रीम मांगता है जो उसकी सेहत के लिए नुकसानदेह हो, लेकिन बाप उसकी ज़िद की वजह से इजाज़त दे देता है। तो इस इजाज़त का मतलब सिर्फ़ वक़्ती इजाज़त है, हुक्म नहीं है कि जब भी मौक़ा मिले आइसक्रीम खा लें।

इसी तरह ग़ुलामों और कनीज़ों को रखने की इजाज़त भी इस हद तक थी जिस हद तक समाज में इसका रिवाज था। अब चूँकि इन्सानी अक़्ल इसको क़ुबूल नहीं करती और जेनेवा कन्वेंशन की सूरत में दुनिया के देशों का इस पर इत्तेफ़ाक़ है कि ग़ुलामी क़बीह है और इसको मुकम्मल ख़त्म कर दिया जाएगा, लिहाज़ा इस्लाम का भी यही हुक्म होगा। यह ऐसी चीज़ नहीं जिस को इस्लाम ने पसन्दीदा निगाहों से देखा हो, बल्कि हमेशा बुरदा फ़रोशी को बुरा क़रार दिया।

वह ढेरों आयात और अहादीस भी हैं जिनमें अदालत का हुक्म है, हर वह हुक्म जो अदालत के ख़िलाफ़ हो इस्लाम में बेकार बातिल माना जाएगा। लिहाज़ा आज दाएश और इस जैसे और गिरोह ग़ुलामी और कनीज़ी के तसव्वुर पर अमल कर रहे हैं। यह इस्लाम की शिक्षाओं को बदनाम करने के सिवा कुछ नहीं कर रहे।

लेख: सैय्यद जव्वाद हुसैन रिज़वी
अनुवाद : आदिल अब्बास

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