विलादत और ज़ुहूर में फ़र्क़

पिछले कुछ वक़्त से कुछ दुश्मने इस्लाम की साज़िशों से ग़ाफ़िल लोग एक ऐसी बात का फ़साद बना रहे जो हमारे यहां आज तक इख़्तिलाफ़ी नहीं रही। हमारे उलेमा और ख़ुद अवाम भी मासूमीन (अस) की विलादत का जश्न मनाया करते थे और सभी गर्व से मौला अली (अस) मौलूदे काबा कहते थे लेकिन कुछ समय से शेखियत की कुवैती तबलीग़ की वजह से अवाम को इस मसले में उलझाया गया है कि मासूमीन (अस) की विलादत होती है या उनका ज़ुहूर होता है।

सबसे पहले तो हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि इन फ़सादियों का ज़ुहूर या नुज़ूल से क्या मतलब है। यह फ़सादी लोग कहते हैं कि मासूमीन कि विलादत नहीं हो सकती है और ना ही वह अपने बुज़ुर्गों के असलाब में होते हैं और ना ही वह अपनी माँ के पेटों में होते हैं और ना ही उनकी विलादत होती है। उनका अक़ीदा यह है कि मासूमीन (अस) आसमान से सीधे नाज़िल होते हैं और शिकमों (पेट) और अरहाम(कोख) में नहीं होते। इन के बातिल(ग़लत) अक़ीदे की दलील में कोई स्पष्ट हदीस नहीं है हालाँकि क़ुरआन की एक आयत में जहाँ नूर के नुज़ूल की बात की गई है वहाँ वह नूर का मतलब आइम्मा(अस) मानते हैं जबकि क़ुरआन के हुक्म के अनुसार यहाँ नूर का मतलब क़ुरआन मजीद है जो रसूल-अल्लाह(सअ) के साथ हिदायत के लिए नाज़िल किया गया। और अगर आइम्मा (अस) मुराद भी हैं तो इस हिसाब से कि वह क़ुरआन की जीती जागती तफ़सीर (व्याख्या) हैं।

आएं पहले हम दोनों लफ़्ज़ समझ लें उसके बाद देखेंगे कि कौन सा लफ़्ज़ मुनासिब है।

ज़ुहूर के ज़ुबानी माअना
लफ़्ज़ ज़ुहूर। जिस की जड़ “ظ. ہ. ر” है। के माअना किसी छुपी चीज़ के ज़ाहिर होने के हैं। लफ़्ज़ ज़ुहूर के इस्तेमाल पर ग़ौर करने से मालूम होता है कि यह लफ़्ज़ शिद्दत के साथ ज़ाहिर होने के माअना में आता है और इसके माअना बहुत ज़्यादा ज़ाहिर हो जाने के हैं और जो चीज़ ज़ाहिर होती है वह इस से पहले छुपी और ग़ायब थी।

विलादत के ज़ुबानी माअना
विलादत लफ़्ज़ बच्चे की पैदाइश के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जब क़ुदरती तौर से मां – बाप के अापस मे रिश्ता बनाए कि औलाद पाने का इरादा हो और उनके इस अमल की वजह से औरत (मां) की कोख में जो बच्चा आता है उसके एक मुद्दत बाद पैदा होने को अरबी में विलादत कहा जाता है।

इन दोनों अल्फ़ाज़ “ज़ुहूर” और “विलादत” के माअना हर अरबी की डिक्शनरी में अासानी से देखे जा सकते हैं।
जैसे : 1: अल-मौरिद, 2: अल-मुनजिद, 3: अल-क़ामूस, 4: हेन्स वहर अरबी से इंग्लिश

इन दो अल्फ़ाज़ के माअना के लिए “राग़िब इसफ़हानी” की “अल मुफ़र्रदात अल क़ुरआन” को भी देखा जा सकता है उन्होंने भी इन लफ़्ज़ की क़ुरआनी आयात और अरबी लिटरेचर का हवाला देकर इनके माअना और इस्तेमाल पर रौशनी डाली है।

अब हम यह मसला मासूमीन (अस) की अदालत में पेश करते हैं कि क्या नुज़ूल / ज़ुहूर का अक़ीदा सही है या नहीं? इन के लिए विलादत का लफ़्ज़ बेहतर है या नुज़ूल / ज़ुहूर का लफ़्ज़ बेहतर है? हम अपने हर मसले में मासूमीन(अस) की तरफ़ रुजू (परामर्श) करते हैं ख़ास तौर पर जब मसले में टकराव हो, बिल्कुल वैसे ही जैसा कि मासूमीन के दौर में होता था। काफ़ी रिवायतें हैं तारीख़ की किताबों में जब लोगों को कोई मसला पेश आता तो मासूमीन (अस) की बारगाह में आते और उनके सामने अपने मसाएल बयान करते और मासूमीन(अस) मसाएल सुलझा दिया करते थे।

इसी तरह हम भी यही मसला मासूमीन(अस) की अदालत में पेश करते हैं। शेख़ कुलैनी ने “उसूले काफ़ी” में एक हिस्सा बनाया है जिस का नाम है : “बाबे मवालीदुल आइम्मा” यानी “कैफ़ियते विलादते आइम्मा” किसी पब्लिकेशन ने इसे दूसरी जिल्द में रखा है तो किसी ने पहली जिल्द में, बहरहाल यह इस किताब में इसी नाम से है।

हालांकि हमेशा से शियों में जो लफ़्ज़ इस्तेमाल होता रहा है वह विलादत का ही रहा है, यह इस दौरान में पता नहीं किस ज़िद्द में लोग यह लफ़्ज़ इस्तेमाल करने लगे हैं और ख़ुद को हक़ीक़ी शिया और मारेफ़त रखने वाला समझने लगे हैं।

इस बाब (चैप्टर) की पहली हदीस७है दो काफ़ी लम्बी चौड़ी है जिस में अबु बसीर रिवायत करते हैं कि उन्होंने एक साल इमाम सादिक़ (अस) के साथ हज किया तो रास्ते में अबवा के मुकाम पर इमाम मूसा काज़िम (अस) की विलादत हुई। इस में ख़ुद अबु बसीर भी बार बार विलादत का लफ़्ज़ इस्तेमाल कर रहे हैं और इमाम(अस) भी। जब इमाम सादिक़ (अस) वापस आए तो असहाब ने मुबारक बाद दी तो इमाम (अस) ने बताया कि जब यह मौलूद पैदा हुआ तो इसने अपना हाथ ज़मीन पर रखा और आसमान की तरफ़ रुख़ किया, फिर इमाम(अस) ने बताया कि रसूल अल्लाह (सअ) और उनके सारे जानशीनों की निशानी होती है। इमाम (अस) फिर बताते हैं कि कैसे आइम्मा(अस) का नुत्फ़ा क़रार पाता है लेकिन हम इस पूरी हदीस का ज़िक्र नहीं करेंगे क्योंकि यह काफ़ी बड़ी हदीस है, इमाम फिर फ़रमाते हैं :

وَ إِذَا سَكَنَتِ النُّطْفَةُ فِى الرَّحِمِ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَ أُنْشِئَ فِيهَا الرُّوحُ بَعَثَ اللَّهُ تـَبـَارَكَ وَ تـَعـَالَى مَلَكاً يُقَالُ لَهُ حَيَوَانُ فَكَتَبَ عَلَى عَضُدِهِ الْأَيْمَنِ وَ تَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ صـِدْقاً وَ عَدْلًا لا مُبَدِّلَ لِكَلِماتِهِ وَ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ وَ إِذَا وَقَعَ مِنْ بَطْنِ أُمِّهِ وَقَعَ وَاضِعاً يَدَيْهِ عَلَى الْأَرْضِ رَافِعاً رَأْسَهُ إِلَى السَّمَاءِ

और जब इमाम का नुत्फ़ा रहमे मादर में क़रार पाए चार महीने गुज़र जाते हैं तो उसमें रूह पैदा की जाती है और अल्लाह तबारक व तआला एक फ़रिश्ते को मुक़रर्र करता है जिसका नाम हैवान है, जो (इमाम) के दाएं हाथ पर लिखता है :
“وَ تَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ صـِدْقاً وَ عَدْلًا لا مُبَدِّلَ لِكَلِماتِهِ وَ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ”
और जब वह अपने माँ के बत्न से बाहर आता है तो अपना हाथ ज़मीन पर रखता है और अपना सिर आसमान की तरफ़ करता है।
(उसूल ए काफ़ी, जिल्द, 1, किताब अल हुज्जा, पेज 241, रिवायत 1, पब्लिश : बेरुत, लेबनान)

आप सारे पढ़ने वाले इस बात पर ग़ौर करें कि इस से बढ़कर विलादत की और क्या दलील हो सकती है? कि मासूमीन(अस) ने ख़ुद ही हक़ीक़त बयान कर दी है कि उनकी विलादत होती है। मासूम मासूम की रट लगाने वाले, और मासूम की पैरवी का नारा बुलन्द करने वाले कहां जाएँगे? लेकिन फिर भी किस ढिठाई से यह फ़सादी मासूमीन के बयानों को झुठलाते हैं।

अब आपके सामने दूसरी हदीस पेश करते हैं :
مـُحـَمَّدُ بـْنُ يـَحـْيـَى عـَنْ مـُحـَمَّدِ بـْنِ الْحـُسـَيْنِ عَنْ مُوسَى بْنِ سَعْدَانَ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْقـَاسـِمِ عـَنِ الْحـَسـَنِ بـْنِ رَاشـِدٍ قـَالَ سـَمـِعْتُ أَبَا عَبْدِ اللَّهِ ع يَقُولُ إِنَّ اللَّهَ تَبَارَكَ وَ تـَعـَالَى إِذَا أَحـَبَّ أَنْ يـَخـْلُقَ الْإِمـَامَ أَمَرَ مَلَكاً فَأَخَذَ شَرْبَةً مِنْ مَاءٍ تَحْتَ الْعَرْشِ فَيَسْقِيهَا أَبـَاهُ فـَمـِنْ ذَلِكَ يـَخـْلُقُ الْإِمـَامَ فـَيـَمـْكـُثُ أَرْبـَعـِيـنَ يَوْماً وَ لَيْلَةً فِى بَطْنِ أُمِّهِ لَا يَسْمَعُ الصَّوْتَ ثُمَّ يَسْمَعُ بَعْدَ ذَلِكَ الْكَلَامَ فَإِذَا وُلِدَ بَعَثَ ذَلِكَ الْمَلَكَ فَيَكْتُبُ بَيْنَ عَيْنَيْهِ وَ تـَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ صِدْقاً وَ عَدْلًا لا مُبَدِّلَ لِكَلِماتِهِ وَ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ فَإِذَا مَضَى الْإِمَامُ الَّذِى كـَانَ قـَبـْلَهُ رُفـِعَ لِهـَذَا مـَنـَارٌ مِنْ نُورٍ يَنْظُرُ بِهِ إِلَى أَعْمَالِ الْخَلَائِقِ فَبِهَذَا يَحْتَجُّ اللَّهُ عَلَى خَلْقِه

हसन बिन राशिद कहते हैं कि मैंने इमाम सादिक़ (अस) को कहते सुना “अल्लाह तबारक व तआला जब इमाम को ख़ल्क़ करना चाहता है तो एक फ़रिश्ते को हुक्म देता है कि एक शरबत अर्श के नीचे से लेकर इमाम के वालिद को पिलाए। तो इमाम की (जिस्मानी) ख़िलक़त इस शरबत से है। फिर चालीस रात और दिन(इमाम) अपनी माँ के शिकम में है और इस दौरान वह कुछ सुन नहीं सकता, और फ़िर उनके कान सुनने के लिए खुल जाते हैं। और जब विलादत होती है तो उसी फ़रिश्ते को मुक़रर्र करता है कि इस की आंखों के बीच लिखे
وَ تـَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ صِدْقاً وَ عَدْلًا لا مُبَدِّلَ لِكَلِماتِهِ وَ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ ۔
और फिर इमाम को नूर का एक मीनार अता किया जाता है जिस से वह बन्दों के आमाल देखता है और जिस के ज़रिए अल्लाह अपने बन्दों पर हुज्जत तमाम करता है।
(उसूल ए काफ़ी, जिल्द 1, पेज 242, रिवायत 2, बेरुत)

इस बाब के आख़िर में एक हदीस नक़्ल की जाती है जिस में इमाम बाक़िर(अस) इमाम की दस निशानियां बयान फ़रमाते हैं, जिस की पहली और दूसरी निशानी इस तरह बयान की गई है :
عَنْ زُرَارَةَ عَنْ أَبِى جـَعـْفَرٍ ع قَالَ لِلْإِمَامِ عَشْرُ عَلَامَاتٍ يُولَدُ مُطَهَّراً مَخْتُوناً وَ إِذَا وَقَعَ عَلَى الْأَرْضِ وَقَعَ عَلَى رَاحـَتـِهِ رَافـِعـاً صـَوْتـَهُ بـِالشَّهـَادَتَيْنِ
ज़रारा इमाम बाक़िर से नक़्ल करते हैं : “इमाम की दस निशानियाँ होती हैं, 1: वह पाक व पाकीज़ा और ख़त्ना-शुदा पैदा होता है, 2: और जब दुनिया में आता है तो अपने हाथ ज़मीन पर रखता है और शहादतैन के इक़रार की अावाज़ बुलन्द करता है।”
(उसूल ए काफ़ी, जिल्द 1, पेज 243, रिवायत 8, बेरुत, लेबनान)

आप लोग ग़ौर करें कि यहां इस रिवायत में साफ़ मासूम(अस) ख़ुद फ़रमा रहे हैं कि आइम्मा पैदा होते हैं और उनकी विलादत होती है लेकिन इन की विलादत और हमारी विलादत में फ़र्क़ है, वह पाक और पाकीज़ा ख़तना शुदा पैदा होते हैं।

हम हक़ीक़त तलाश करने वालों के लिए मासूम (अस) की तालीम की हुई कुछ ज़ियारात से भी वह जुम्ले नक़्ल करे देते हैं जहां मासूमीन की विलादत का ज़िक्र किया गया है, वक़्त की कमी वजह से उन सारी ज़ियारात का ज़िक्र करना यहां मुमकिन नहीं जिनमे विलादत का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है फिर भी हम कुछ का ज़िक्र कर रहे कि हमारे दावे को और दलील मिल जाएं।

1: सैय्यद इब्ने ताऊस ने मिस्बाह उज़ ज़ायरीन में एक ज़ियारत नक़्ल की है :
السلام على المولود في الكعبة المزوج في السماء
सलाम हो उस पर जो काबा ए मुक़द्दस में पैदा हुआ जिस की तज़वीज आसमान में हुई।
(मफ़ातिउल जिनान, आमाले रजब)

2: एक ज़ियारत है जिसको शेख़ मुफ़ीद और सैय्यद ताऊस ने रिवायत की है कि छठे इमाम ने 17रबीउल अव्वल को अमीरुल मोमिनीन की ज़ियारत में यह ही ज़ियारत पढ़ी और अपने भरोसेमंद सहाबी मुहम्मद बिन मुस्लिम सक़फ़ी को भी तालीम फ़रमाई। इस ज़ियारत में एक जगह यह जुम्ले आए हैं।
السلام علیک يامن ولد في الكعبة وزوج في السماء بسيدة النساء وكان شهودها الملائكة الاصفياء
सलाम हो आप पर जो काबे में पैदा हुआ जिसका आसमान में सैय्यदा ज़हरा (स) से निकाह हुआ और चुने हुए फ़रिश्ते उसमें गवाह बने।
(मफ़ातिउल जिनान, आमाले रजब)

हम अपनी बात की दलील के तौर पर एक दुआ के जुम्ले भी नक़्ल कर देते हैं :
أللهم انى اسئلك بالمولودين في رجب محمد بن علي الثاني وابنه علي بن محمد…………..
ऐ माबूद! माहे रजब में पैदा होने वाले दो मालूदों के वास्ते से सवाल करता हूँ जो मुहम्मद बिन अली सानी (इमाम मुहम्मद तक़ी) और उनके फ़रज़न्द अली बिन मुहम्मद (इमाम अली नक़ी)
(मफ़ातिउल जिनान, आमाले रजब)

इन सारी दलीलों के पेश करने के बाद अब हम यह फ़ैसला आप सब के ऊपर छोड़ते हैं कि आप मासूमीन (अस) की विलादत को ज़ुहूर कहते हैं या विलादत। क्योंकि मासूमीन तो अपनी और अपनी औलाद की विलादत को ज़ुहूर कहीं पर भी कहते हुए नज़र आते। ना ही कोई हदीस, ना ही कोई ज़ियारत, ना ही कोई दुआ का जुम्ला ऐसा मिलता है जहां मासूम ने विलादत की जगह ज़ुहूर का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया हो, अब आप पर है कि आप मासूमीन (अस) के नक़्शे क़दम पर चलते हुए उनका तरीक़ा अपनाते हैं या फिर उन अफ़राद का जो जिहालत की वजह से, ज़िद की वजह, दूसरों के बहकावे की वजह से ज़ुहूर का लफ़्ज़ इस्तेमाल करते हैं विलादत के लिए।

आख़िर में हम यही कहना चाहते हैं कि बेहतर है कि हम अपनी ज़िद को छोड़कर उलेमा ए हक़ की बात पढ़ें, सुने, समझे और उस पर अमल करें और ऐसी गलतियां ना करें जिस से दीन ए इस्लाम को नुक़सान हो। अनजाने में ही सही हमारी हठधर्मिता इसकी वजह बन जाती है। जिन लोगों ने मासूमीन (अस) की विलादत का इंकार कर के ज़ुहूर और नुज़ूल का अक़ीदा अपनाया इन्होने अनजाने में मासूमीन की बहुत सारी फ़ज़ीलतों का इंकार कर दिया, जैसे कि मौला अली(अस) के मौलूदे काबा होने का इंकार, आइम्मा (अस) की पाक व पाकीज़ा पैदा होने का इंकार, मासूमीन की रिवायात का इंकार, मासूमीन की तालीम की हुई दुआओं और ज़ियारात का इंकार वग़ैरह वग़ैरह। ख़ुद अन्दाज़ा करें कि एक ग़लत दावे से कितनी सारी सच्ची फ़ज़ीलतों का इंकार कर दिया।

हमारी दुआ है सारे मोमिनीन के लिए कि वह किसी के बहकावे में आकर ऐसी कोई ग़लती ना करें कि वह अपने ही दीन के लिए दुश्मनी बन जाए और हमें एहसास भी ना हो।
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स्रोत :
रिवायात का अनुवाद और उन पर कमेन्ट “सैय्यद जव्वाद हुसैन रिज़वी”(पाकिस्तानी) के मज़मून “विलादत और ज़ुहूर में फ़र्क़” से नक़्ल हैं और कई जगह उन्हीं की ज़ुबान लिखने की कोशिश की है।
हमने आर्टिकल में जिन किताबों का सहारा लिया है वह यह हैं :
1: अल-काफ़ी, बेरुत
2: मफ़ातिउल जिनान
3: अल मुनजिद
4: अल मौरिद
5: अल क़ामूस
_______________________________

लेख : आदिल अब्बास

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