सूरह नास की तफ़सीर

तफ़सीर ए क़ुरआन : सूरह नास

بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाह हिर रहमानिर रहीम

قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ ﴿١﴾
क़ुल अओज़ो बिबरब्बिन नास

مَلِكِ النَّاسِ ﴿٢﴾
मलिकिन्नास
إِلَـٰهِ النَّاسِ ﴿٣﴾
इलाहिन्नास

مِن شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ ﴿٤﴾
मिन शररिल वसवासिल ख़न्नास

الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ ﴿٥﴾
अल्लज़ी युवसविसो फ़ी सुदूरिन नास

مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ ﴿٦﴾
मिनल जिन्नति वन्नास
—————————————————

हिन्दी तर्जुमा

शुरू अल्लाह के नाम से जो रहमान व रहीम है

1: कह दिये मैं लोगों के परवरदिगार की पनाह मांगता हूँ
2: लोगों के मालिक व हाकिम की
3: लोगों के ख़ुदा और माबूद की
4: ख़न्नास के वसवसों के शर से
5: जो इन्सानों के सीनों में वसवसे डालता है
6: चाहे वह जिन्नात मे से हो या इन्सानों में से
—————————————————-

तफ़सीर

लोगों के परवरदिगार की पनाह मांगता हूँ

इस सूरह में, जो क़ुरआन मजीद का आख़री सूरह है, लोगों के लिए नमूना और पेशवा होने के लिहाज़ से ख़ुद पैग़म्बर (स) की तरफ़ बात का इशारा करते हुए फ़रमाता है : कह दिये मैं लोगों के परवरदिगार की पनाह मांगता हूँ।
مَلِكِ النَّاسِ
मलिकिन्नास
लोगों के मालिक व हाकिम की।

إِلَـٰهِ النَّاس
इलाहिन्नास
लोगों के ख़ुदा व माबूद की।

तवज्जो करने वाली बात यह है कि यहां ख़ुदा की अज़ीम सिफ़ातों में से तीन सिफ़ात (रुबूबियत, मिल्कियत, और आलूहिय्यत) का ज़िक्र हुआ है जो सब की सब सीधे तौर पर इन्सान की तरबियत और वसवसे डालने वालों के चंगुल से निजात के साथ जुड़ी है।
हालांकि ख़ुदा से पनाह मांगने से मुराद यह नहीं है कि इंसान सिर्फ़ ज़ुबान से यह जुमले कहे, बल्कि फ़िक्र व नज़र और अक़ीदे व अमल के साथ भी इन्सान ख़ुद को ख़ुदा की पनाह में क़रार दे। शैतानी रास्तों, शैतानी प्रोग्रामों, शैतानी फ़िक्रों व तबलीग़ात, शैतानी मजालिस व महफ़िलों से ख़ुद को दूर रखे, और रहमानी फ़िक्रों व तबलीग़ात के रास्ते को अपनाए। वरना वह इन्सान जो अमली तौर पर इन वसवसों के तूफ़ान में ठहरा रहेगा वह सिर्फ़ इस सूरह के पढ़ने और इन लफ़्जों के कहने से कहीं नहीं पहुंचेगा।
वह ” رَبِّ النَّاسِ “(रब्बिन्नास) कहने के साथ परवरदिगार की रुबूबियत का एतराफ़ करता है और ख़ुद को उसकी तरबियत में क़रार देता है।
(मलिकिन्नास):” مَلِكِ النَّاسِ ” कहने से ख़ुद को उस की मिल्कियत समझता है और उसके फ़रमान का बन्दा हो जाता है।
और इलाहिन्नास ” إِلَـٰهِ النَّاس ” के कहने से उसकी उबूदियत के रास्ते में क़दम रख देता है और उसके ग़ैर की इबादत से परहेज़ करता है। इसमें शक नहीं है कि जो शख़्स इन तीनों सिफ़ात पर इमान रखता हो और ख़ुद को इन तीनों सिफ़ात के हम अाहंग कर ले, वह वसवसा डालने वालों के शर से अमान में रहेगा।

हक़ीक़त में यह तीनों सिफ़ात तीन अहम तरबियती पाठ(लेसन), पेश रफ़्त के तीन प्रोग्राम और वसवसे डालने वालों के शर से निजात के तीन ज़रिये हैं और यह सूरह इन्सान का उनके मुक़ाबले में बीमा कर देता है।
इसी लिए बाद वाली आयत में और कहता है : वसवसा डालने वाले ख़न्नास के शर से
( مِن شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاس )
मिन शररिल वसवासिल ख़न्नास

वही जो इन्सानों के सीनों में वसवसे डालते हैं। ( الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاس )
जिन्नों और इन्सानों में से वसवसे डालने वाले। ( مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاس )
वसवास(وسواس) का लफ़्ज़ “मुफर्रदात” में “राग़िब” के कहने के मुताबिक़ अस्ल में ऐसी अाहिस्ता आवाज़ है जो आलाते-ज़ीनत के आपस में टकराने से पैदा होती है।
इसके बाद हर आहिस्ता आवाज़ पर बोला जाने लगा और उसके बाद ऐसे नामतलूब और बुरी फ़िक्रों व ख़यालात पर, जो इंसान के दिल व जान में पैदा होते हैं, और ऐसी आहिस्ता आवाज़ की तरह जो कान में कही जाती है, उसकी तरह बताया गया है।
वसवास मसदरी-माएना(source meaning) रखता है, लेकिन कुछ जगह फ़ाएल(فاعل)=कोई काम का करने वाला: वसवसा डालने वाला, के माएना में भी आता है, और इस आयत में यही माअना है।
ख़न्नास(خنّاس), ख़ुनूस(خنوس) (ख़ुसूफ़ के वज़न पर) के माद्दे(root) से है, सीग़ा-ए-मुबालेग़ा (hyperbole) है, दो जमा होने और पीछे जाने के माअना में है। इसकी वजह यह है कि जब ख़ुदा का नाम लिया जाता है तो शैतान पीछे हट जाते हैं और चूंकि यह काम छुपा होने के साथ एक साथ जुड़े हुए हैं, लिहाज़ा यह लफ़्ज “اختفاء”(गुमशुदगी) के माअना में भी आया है।
इस बिना पर आयत का मफ़हूम इस तरह होगा : “कह दिये मैं शैतान सिफ़त वसवसा डालने वाले के शर से; जो ख़ुदा के नाम से भागता है और छुप जाता है, ख़ुदा की पनाह मांगता हूं।”
उसूलन “शैतान” अपने प्रोग्रामों को छुप कर करते हैं और वक़्तों में इन्सान के दिल के कान में इस तरह से फूंक मारते हैं कि इंसान यह यक़ीन कर लेता है, कि यह फ़िक्र ख़ुद उसी की फ़िक्र है और ख़ुद उसी के दिल में ख़ुद बा ख़ुद पैदा हुई है, और यही बात उस के बहकने और गुमराही की वजह बन जाती है।
शैतान का काम ज़ीनत देना, बातिल को हक़ के लिबास में छुपाना, झूठ को सच के छिलके में लपेट कर गुनाह को इबादत के लिबास में और गुमराही को हिदायत के सरपोश में पेश करना है।
ख़ुलासा यह है कि वह ख़ुद भी छुपे होते हैं और उनके प्रोग्राम भी छुपे होते हैं, और यह राहे हक़ के सारे राहियों के लिए एक चेतावनी है जो यह उम्मीद नहीं रखते कि शैतानों को उनके अस्ली चेहरे और हुलिये में देखें या उनके प्रोग्रामों को भटकी सूरत में महसूस करे। सोचने की बात है, वसवसे डालने वाले खन्नास होते हैं और उनका काम छुपाना, झूठ बोलना, धोखा देना, दिखावा करना, ज़ाहिर साज़ी और हक़ को छुपा देना है।
अगर वह अस्ली सूरत में सामने आ जाएं, अगर वह बातिल को हक़ के साथ ना मिलाएं, अगर वह सीधी और साफ़ बातें करें तो अली(अस) के कहने के मुताबिक़ “ख़ुदा की राह पर चलने वालों के लिए मतलब छुपा ना रहता”।
वह हमेशा कुछ हिस्सा तो इस से लेते हैं, और कुछ हिस्सा उस से और उन्हें आपस में मिला देते हैं, जिस से कि लोगों पर हावी हो सकें, जैसा कि अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम इसी बातचीत को जारी रखते हुए कहते हैं فھنالک یستولی الشیطان علی اولیاء

“अल्लज़ी युवसवेसो फ़ी सुदूरिन-नास” का अर्थ और लफ़्ज़ “वसवसा” का चुनाव, और लफ़्ज़ “सुदूर”(सीने, छाती) भी इसी माअना की तरफ़ इशारा हैं।
यह सब कुछ तो एक तरफ़, दूसरी तरफ़ से “मिनल जिन्नते वन्नास” का जुम्ला ख़बरदार करता है कि “वसवसे” में डालने वाले ख़न्नास, सिर्फ़ एक ही गिरोह, एक ही जमात, एक ही तबक़े, और एक ही लिबास में नहीं होते, बल्कि यह जिन्न व इन्स में फैले हुए हैं और हर लिबास और हर जमात में पाये जाते हैं। लिहाज़ा इन सब पर नज़र रखनी चाहिए और इन सब कुछ शर से ख़ुदा की पनाह मांगनी चाहिए।
ना-मुनासिब दोस्त, भटका साथी, गुमराह और ज़ालिम पेशवा, जब्बार और ताग़ूती कारिंदे, फ़ासिद लेखक और वक्ता, खुले और छुपे इल्हादी और इल्तेक़ाती मकातिब और सामूहिक रूप से वसवसे डालने वालों के आपसी मेल जोल के साधन वग़ैरह सब के सब “वसवास ख़न्नास” के बड़े मायनों में शामिल हैं कि जिन के शर(बुराई) से इन्सान को खुदा की पनाह मांगनी चाहिए।
(आगे बढ़ने से पहले हम पढ़ने वालों के लिए इल्हाद व इल्तेक़ाती मकातिब का मतलब बयान कर दे, इल्हादी यानी इस फ़िक्र के लोगों का समूह जो किसी भी ईश्वर को नहीं मानता इनकी नज़र में दुनिया का वुजूद हादसे है और सब मज़हब इन्सानों के बनाए हुए हैं। “इल्तेक़ाती” यानी इस फ़िक्र के लोग जिनकी नज़र में कोई भी बात या नज़रिया पूरी तौर पर सही नहीं होता सब में ग़लतियाँ होती हैं दरअसल इनकी फ़िक्र पर ग़ौर कीजिए तो यह ख़ुद अपनी ही कही बात की ग़लती का सबूत दे रहे अपनी बेढंगी फ़िक्र के मुताबिक़)

कुछ बिन्दु(प्वाइंट)

1: हम ख़ुदा की पनाह क्यों मांगते हैं?
इन्सान के लिए हर लम्हा सही राह से भटकने का मौक़ा मौजूद है और उसूली तौर पर जब ख़ुदा अपने पैग़म्बर को यह हुक्म दे रहा है कि “वसवास ख़न्नास” के शर(बुराई व नुक़सान) से ख़ुदा की पनाह मांगें, तो यह ख़न्नासों और वसवसा डालने वालों के धोखे में गिरफ्तार होने के मौक़े का सबूत है।
बावजूद इसके कि पैग़म्बर अकरम(सअ) लुत्फ़े इलाही, ग़ैबी सहायताओं और अपने आप को ख़ुदा के सुपुर्द करने की बिना पर हर क़िस्म के बहकावे से सुरक्षित थे, लेकिन फिर भी वह इन आयात को पढ़ते थे और इनके ज़रिए वसवास ख़न्नास के शर से पनाह मांगते थे। इन हालात में दूसरों का मामला वाज़ेह और रौशन है।
लेकिन मायूस होने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि इन हानिकारक वसवसा डालने वालों के मुक़ाबले में मोमिन बन्दों और राहे हक़ के राहियों की मदद के लिए आसमानी फ़रिश्ते आते हैं। हाँ! मोमिन तन्हा नहीं हैं, फ़रिश्ते उन पर नाज़िल होते हैं और उनकी मदद करते हैं :

लेकिन बहरहाल मग़रूर हरगिज़ नहीं होना चाहिए, और ख़ुद को उपदेश व सलाह व नसीहतों और ख़ुदाई सहायताओं से बेनियाज़ नहीं समझना चाहिये। बल्कि हमेशा उस से पनाह मांगनी चाहिए और हमेशा बेदार और होशियार रहना चाहिए।

2: इस बारे में कि तीन आयात में “नास” का तकरार(रिपीट) क्यों हुआ है? कुछ ने तो यह कहा है कि इसकी वजह यह है कि इसका हर जगह पर अलग अलग अर्थ है।
लेकिन ज़ाहिर यह है कि यह ख़ुदा की इन तीन सिफ़ात की व्यापकता(यूनिवरसैलिटी) पर ज़ोर देने के लिए है और तीनों जगह पर एक ही अर्थ रखता है।

3: एक रिवायत में पैग़म्बर अकरम(सअ) से आया है :

हर मोमिन के दिल में दो कान होते हैं, एक कान में तो फ़रिश्ता फूंक मारता है और दूसरे कान में वसवास और ख़न्नास फूंक मारता है। बस ख़ुदा मोमिन की फ़रिश्ते के ज़रिए ताईद फ़रमाता है। और आयत का मतलब यही है।
(मजमउल बयान, जिल्द 10, पेज 175)

एक और पुर माअना हदीस में इमाम जाफ़र सादिक़ (अस) से आया है कि :
(वह लोग जो कभी कोई बुरा काम अन्जाम देते हैं, या ख़ुद अपने ऊपर ज़ुल्म करते हैं, और अपने गुनाहों के लिए अस्तग़फ़ार करते हैं) नाज़िल हुई, तो इब्लीस मक्का में पहाड़ के ऊपर गया और ऊंची आवाज़ के साथ फ़रयाद बुलंद की और अपने लश्कर के सरदारों को जमा किया।
उन्होंने कहा : ऐ आक़ा! क्या बात है, आप ने हमें क्यों बुलाया है?
उस ने कहा : यह आयत नाज़िल हुई है (इस आयत ने मेरी कमर में कंपकंपी पैदा कर दी है और यह आयत निजाते बशर(इन्सान) की वजह) तुम में से कौन है जो इसका मुक़ाबला करे?
बुज़ुर्ग शैतानों में से एक ने कहा : मै ऐसा करता हूं, मेरा मंसूबा यह है।
इब्लीस ने उसके उस मंसूबे को ना पसन्द कर दिया! तो दूसरा खड़ा हुआ और उसने अपना मंसूबा पेश किया, लेकिन यह भी क़ुबूल ना किया गया।
इस मौक़े पर “वसवास ख़न्नास” खड़ा हुआ और उसने कहा : मै इस काम को अन्जाम दूँगा।
इब्लीस ने कहा : वह कैसे?
उस ने कहा : मै उन्हें वादों और आरज़ुओं में सरगरम कर दूँगा, यहाँ तक के वह गुनाह में आलूदा हो जाएंगे, जब वह गुनाह कर लेंगे तो मै उन्हें तौबा करना भुला दूँगा।
इब्लीस ने कहा : तू इस काम को अन्जाम दे सकता है।(तेरा मन्सूबा बहुत माहिराना और सबसे बेहतर है) और यह काम क़यामत तक उसके सुपुर्द कर दिया।
(अल-मीज़ान, जिल्द 20, पेज नम्बर 557)
ख़ुदा वन्दा! हमें इन सब वसवसा डालने वालों के शर से और ख़न्नास के तमाम वसवसों से महफ़ूज़ फ़रमा।
परवरदिगार! धोखे की क़ैद सख्त है, और दुश्मन बेदार और उसके मंसूबे छुपे हुए हैं और तेरे लुत्फ़ के बिना निजात मुमकिन नही है।

ऐ परवरदिगार! मुमकिन है हम से इन आयात की तफ़सीर में कुछ भूल चूक हो गई हों, तो वह सब हमें बख़्श दे और हम उम्मीद रखते हैं कि तेरे बन्दे भी हमें बख़्श देंगे।

पूरी तहरीर में तफ़सीर ए नमूना की मदद ली गई है हमने बस उसे हिन्दी में करने और मुश्किल शब्दों को समझाने की कोशिश की है।

…………………………………………………….
मोहताज दुआ : आदिल अब्बास

Advertisements

One thought on “सूरह नास की तफ़सीर

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s