हिज़्बुल्लाह : हम उम्मते हिज़्बुल्लाह हैं

हिज़्बुल्लाह

जबल आमिल की सरज़मीन पर क़ायम अरब दुनिया की जानी-मानी मुस्लिम अस्करी तनज़ीम जिस ने ताक़त के नशे में चूर कट्टर इस्राइली फ़ौजों के दांत खट्टे किये पहले जिसने इस्राइल की हिमायत में लेबनान में विराजमान अमेरिकी और उसकी इत्तेहादी फ़ौजों को फ़रार पर मजबूर किया और दूसरी यह कि इस्राइली फ़ौजों को अपनी ज़मीन से जान बचा कर भागने पर मजबूर कर दिया।
शुरू में यह तनज़ीम सिर्फ़ शिया मुजाहिदीन को भर्ती करती थी लेकिन नब्बे के दशक में इस तनज़ीम के दरवाज़े दूसरे लेबनानियों के लिए खोले गये। जिन में ईसाई, अहले-सुन्नत और द्रूज़ शामिल हैं। हिज़्बुल्लाह का आग़ाज़ एक बहुत छोटे से गिरोह से हुआ, आज उसका शुमार ना सिर्फ़ इस ख़ित्ते बल्कि दुनिया भर की मुनज़्ज़म तरीन तनज़ीमों में होता है। आज हिज़्बुल्लाह लेबनानी पार्लियामेंट के असरदार तरीन इत्तेहाद जिसे “8 मार्च के इत्तेहाद” के नाम से जाना जाता है की सरबराही कर रही है।
हिज़्बुल्लाह का अपना रेडियो और सेटेलाइट टी. वी. चैनल है, हिज़्बुल्लाह के समाजी व मुआशी तरक़्क़ी के मनसूबे इस तनज़ीम को अपने ज़माने की तमाम मुस्लिम अस्करी व ग़ैर-अस्करी तनज़ीमों से मुमताज़ करते हैं।
हिज़्बुल्लाह की निगरानी में कई संगठन अलग अलग समाजी सेवाएं अन्जाम दे रहें हैं जिन में मुअस्ससाए शोहदा, जिहाद अल बनाई, मुअस्ससाए अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुनकर, मुअस्ससाए क़ज़ा, सेहते आम्मा के इदारे, कृषि विकास के संगठन, अस्पताल, डिस्पेंसरियां, पार्क, तालीमी इदारे क़ाबिले ज़िक्र हैं। सी. एन. एन. की एक डाक्यूमेंट्री “हिज़्बुल्लाह का रहस्यमय हथियार” के मुताबिक़ हिज़बुल्लाह अपने समाज के लिए वह सब काम अन्जाम देती है जो कोई भी हुकूमत अपने शहरियों की बेहतरी के लिए कर सकती है। इन कामों में कूड़ा इकट्ठा करने से लेकर अस्पताल चलाना और स्कूलों की मरम्मत तक शामिल हैं। (1)

लेबनान की फ़िरक़ा-वाराना तारीख़ :
तुर्क ख़िलाफ़त के खा़तमे के बाद लेबनान की सरज़मीन फ़्रांस के हिस्से में आई। लेबनानियों ने फ़्रांसीसी फ़ौजों के ख़िलाफ़ कई बार लड़ाई के मैदान में उतरे जिसकी वजह से 1943 में लेबनान एक आज़ाद मुल्क के तौर पर दुनिया के नक़्शे पर उभरा। (2) फिर भी यह अाज़ादी फ़्रांस और मारूनी ईसाइयों की ताक़त की पनाह में थी। इस अाज़ादी की वजह से लेबनान में जो निज़ाम क़ायम हुआ उसे ताएफ़ी या फ़िरक़ा-वाराना निज़ाम कहा जा सकता है। जहां ताक़त का स्रोत लेबनान के ईसाई थे। लेबनान में 51 फ़िरक़ों के लोग आबाद हैं जिन में बड़े तीन फ़िरक़े ईसाई, अहले सुन्नत और शिया क़ाबिले ज़िक्र हैं। लेबनान के दस्तूर के मुताबिक़ अधिकारों की तक़सीम के वक़्त पांच, तीन और दो की निस्बत से तक़सीम की जाती है। यानी पांच हिस्से ईसाइयों के, तीन हिस्से अहले सुन्नत के और दो हिस्से अहले तशीअ के लिए रखे गये हैं। (3) हालांकि शिया आबादी के लिहाज़ से लेबनान का सबसे बड़ा फ़िरक़ा हैं। 40 के दशक तक शिया अकसरियती इलाक़ों में सियासत की बाग डोर चन्द ज़मीदारों के हाथों में थी। जो अपने इलाक़ों में हर चीज़ के मालिक थे। इस जागीरदारी निज़ाम की वजह से लेबनान, कुवैत, शाम, बहरैन और सऊदिया के शियों की एक बड़ी संख्या लेफ़्टिस्ट की जमाअतों और कम्युनिस्ट तनज़ीमों की तरफ़ झुक गई। इन तनज़ीमों में शाम(सीरिया) की एस एस एन पी, लेबनान की कम्यूनिस्ट पार्टी, कम्यूनिस्ट लेबर एक्शन की तनज़ीम और सोशलिस्ट अरब बास पार्टी ज़्यादा अहम हैं। (4) यह जमाअतें(गिरोह) शिया नौजवानों को अपने मक़सदों के लिए इस्तेमाल करतीं और उनकी मौत के बाद अपने कारनामों की लिस्ट ग़ैर मुल्की आक़ाओं को भेज कर उनके नाम पर पैसे वसूल करतीं। इस पर फ़िलिस्तीनी मुजाहिदीन के टोले जो घर से बेघर हो चुके थे उनका आना और इसराईली जहाज़ों की बीमारियों ने रहती सहती कसर भी निकाल दी।

इमाम मूसा सद्र :
सैय्यद मूसा सद्र साठ की दहाई में इरान से लेबनान आए। आप के अजदाद का ताल्लुक़ इसी सरजमीं से था। मूसा सद्र ने अशराफ़िया के हाथों से इक़्तिदार की बाग डोर छीन कर आम लोगों को मज़बूत करने में बहुत अहम किरदार अदा किया। उनका कहना था : “जब भी ग़रीब समाजी इन्क़िलाब की तरफ़ बढ़ चलते हैं तो यह इस बात का सबूत है कि ज़ुलमत(बुरे) के दिन गिने जा चुके हैं।”(5)
सैय्यद मूसा सद्र के पहले कारनामों में से एक कारनामा लेबनान के उत्तरी कस्बे बुरजे शुमाली में ऐसे इदारे का क़याम है जिसका काम प्रोफेशनल तालीम देना है। जिसने सैकड़ों बेरोज़गार और घर से बेघर यतीमों को छत और रोज़गार मुहैय्या किया, और यह इदारा मूसा सद्र के नज़रियात की सबसे पहली दर्सगाह ठहरा। जहां के इलाही तालीमात से भरपूर नौजवानों ने आगे चलकर लेबनान की तारीख़ में बहुत अहम काम सर-अन्जाम दिये। मूसा सद्र इस अहम काम के बाद इलाक़े के महरूमीन(वंचित) लोगों को बुनियादी हुक़ूक़ दिलाने के लिए सरगरम हो गये। इसी मक़सद को नज़र में रखते हुए आप ने 1969 में मजलिसे इस्लामी शिया क़ायम की और उसके वुजूद को लेबनान की पार्लियामेंट से मनज़ूर करवाया। (6) इस तनज़ीम का क़याम मूसा सद्र की हैसियत और उनके असर का हैरान करने वाला सबूत था। इस तनज़ीम ने अपने क़याम के साथ ही सुधार के लिए लेबनान की हुकूमत के सामने मांगे रख दीं। जिस में तालीमी, अस्करी, दिफ़ाई, हिफ़ज़ाने सेहत से मुतालिक़ मांगें क़ाबिले ज़िक्र हैं। इन मांगों को हासिल करने के लिए मूसा सद्र ने कई प्रदर्शन और भूख हड़तालें कीं। आप की सियासी कार्यवाहियों में से मजलिसे जुनूब का क़याम और बीस मांगे क़ाबिले ज़िक्र हैं। इन सारी कार्यवाहियों पर अवाम की हिमायत हासिल करने के लिए मूसा सद्र ने 1973 में “हरकत-ए-महरूमीन” के क़याम का ऐलान किया। (7) मूसा सद्र की अब तक की कार्यवाहियों ने लेबनान के शियों में आप का एहतराम और चाहत इस हद तक भर दी थी कि आप के ऐलान के साथ ही बूढ़े, जवान और बच्चे हरकते महरूमीन के आॅफ़िसों के बाहर मेम्बर बनने के लिए जमा हो गए। हरकते महरूमीन के प्रबंधक(मैनेजर) डॉ मुस्तफ़ा चमरान अवामी जोश व जज़्बे को इन अल्फ़ाज़ में क़लमबन्द करते हैं :
नौजवान बाएं बाज़ू(लेफ़्टिस्ट) के गिरोहों से अलग हो कर इस तनज़ीम में शामिल होना शुरू हो गये। यह तनज़ीम अक़ीदे की बुनियाद इस्लामी नज़रियात की बुनियाद पर बनी। हर शख़्स अपने अन्दर एक तूफ़ान महसूस करता और अश्क बहाता। लोग कस्बों और देहातों में हरकते महरूमीन के आॅफ़िसों के सामने जमा होकर अपना नाम लिखवाते। हम नहीं चाहते थे कि उन सब को क़ुबूल करें। क्योंकि हम जानते थे कि हम अभी इतने संगठित नही हुए हैं कि इतने सारे लोगों की तरबियत कर सकें। हम नही चाहते थे कि दूसरे सियासी गिरोहों की तरह एक नई दुकान बनाकर बैठ जाएं। जिस का काम झूठ बकना, इल्ज़ाम लगाना झूठे, हेरा-फेरी और हुकूमतों से सौदेबाज़ी या अपने फ़ायदों का बंटवारा हो। हमारी तहरीक की जड़ ख़ुदा पर विश्वास था। इस तहरीक का लेबनान के रिवाजी दीन से दूर दूर का भी वास्ता ना था। (8)
जाने माने अंग्रेज़ विचारक रिचर्ड नाॅरटन जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी के 30 साल लेबनान में गुज़ारे अपनी किताब हिज़्बुल्लाह में इस वक़्त के हालात को यूं लिखते हैं :
मूसा सद्र शान्ति पसन्द और सियासी इन्सान थे वह जंग को पसन्द ना करते थे। हालाँकि लेबनान में ताक़त और हथियारों की सियासत ने उनकी सारी सियासी कोशिशों को पूरा ना होने दिया। (9)
उस वक़्त लेबनान में एक तरफ़ फ़िलीस्तीनी मुहाजिरीन(रिफ्यूजी) की अलग अलग ख़याल रखने वाले गिरोह थे जिन्हें इस्राइल से लड़ने के लिए मुख़तलिफ़ अरब व ग़ैर अरब देशों ने भारी हथियार दिये थे तो दूसरी तरफ़ ईसाई कताएब(ब्रिगेड) जिन के क़िला नुमा घर इस्राइली हथियारों से छलकते नज़र आते थे। कताएब और फिलिस्तीनी मुहाजिरीन(रिफ्यूजी) की आपसी जंगे हर रोज़ की कहानी थी। कभी कताएब फ़िलिस्तीनियों के कैम्पों पर तोपख़ाने से बमबारी करते तो कभी फिलिस्तीनी कताएब के क़िलों को फ़तह करते नज़र आते। मूसा सद्र फिलिस्तीनी मज़ाहमत(रेजिस्टेंस) को जो कि कताएब के हमलों के निशाने पर थी एक पाक शोला ख़याल करते थे और यह समझते थे कि अगर फ़िलिस्तीनी कताएब के ख़िलाफ़ लड़ते रहे तो इस्राइल के मुक़ाबले में उनकी ताक़त कमज़ोर पड़ जाएगी। इसी पाक शोले की हिफ़ाज़त के लिए मूसा सद्र अपने मकतब के नौजवानों के हमराह फ़िलिस्तीनियों के कताएब और इस्राइल के ख़िलाफ़ जिहाद में अमली तौर पर शामिल हो गए। आप ने तहरीक मज़लूमीन के अस्करी-विंग सेनाओं लेबनानी रेजिस्टेंस (अमल मिलिशिया) की बुनियाद रखी। इस अस्करी तनज़ीम के क़याम का मक़सद कताएब के मुक़ाबले में आकर फ़िलिस्तीनियों के सर से कताएब के अज़ाब को दूर रखना था। (10) शुरु में इस तनज़ीम के वुजूद को रहस्य रखा गया। तनज़ीम के बानी डॉ मुस्तफ़ा चमरान अमल की तरबियत के बारे में अपनी किताब लेबनान में यूं लिखते हैं :
इस तनज़ीम ने 1974 में शिया नौजवानों की तरबियत का काम संभाला। यह तरबियत शाम की सरहद के क़रीब बालबेक के पहाड़ों में दी जाती थी। इस तरबियत में फ़िलिस्तीनी तनज़ीम आज़ादी ने हमारा बहुत साथ दिया। फ़िलिस्तीनी रहनुमा यासिर अराफ़ात कई बार इस केन्द्र में आये। यासिर अराफ़ात ही इस मरकज़ के फ़ौजी स्नातकों(ग्रैजुएट) से ख़िताब करते थे। (11)

लेबनान की ख़ाना जंगी और अमल :

अमल मिलिशिया ने फ़िलिस्तीनियों की जंग को अपने सर लिया और तहरीक आज़ादी फ़िलिस्तीन के इस शोले को रौशन रखा। इस सिलसिले में उन्होंने बहुत बलिदान दिये। 1975 में अमल के तरबियती केन्द्र में दौराने तरबियत होने वाले धमाके की वजह से इस तनज़ीम और शिया नौजवानों की तरबियत की ख़बर जंगल की आग की तरह फैल गई। जिस के बाद मूसा सद्र ने 2 जून 1975 को अमल मिलिशिया के वुजूद का बाक़ायदा ऐलान कर दिया। (12) इस छोटे से गिरोह जिसके पास ज़रूरत का सामान भी नहीं था, लेबनान की ख़ाना जंगी के रक्तमय(ख़ूनी) साल बहुत बुलन्द हौसले और अज़ीम बलिदानों के साथ गुज़ारे। लेबनान की ख़ाना जंगी के बारे में डॉ मुस्तफ़ा चमरान के बयान खुलासा नीचे लिखा है :
लेबनान की ख़ाना जंगी इस्राइल और अमेरिकी साज़िश थी। जिस का मक़सद फ़िलिस्तीनी रेजिस्टेंस को ख़त्म करना था। इस जंग की शुरूआत से ही यह बात तय थी कि कताएब और हिज़्बुल लेबनानी ने अपने आप को इस्तेमार के हाथों बेच दिया है। इन का मक़सद इस्राइलियों और अमेरिकियों से छूट हासिल करना था और वह चाहते थे कि मुसलमानों से बदला लें। इस बात में कोई शक नहीं कि फ़िलिस्तीनियों पर पहला गोला कताएब ने फेंका और ख़ाना जंगी की शुरूआत भी कताएब ही ने की। फ़िलिस्तीनी रेजिस्टेंस इस जंग से दूरी की कोशिश करती रही जिस में वह कई बार भी हुई। फ़िलिस्तीनियों ने मूसा सद्र को कई बार कहा कि वह जंग को ख़त्म कराने के लिए अपना प्रभाव इस्तेमाल करें। मूसा सद्र जंग की आग को ठण्डा करते तो दाएं और बाएँ बाज़ू के गिरोह उस आग को दोबारा भड़का देते थे। आखिरकार 1975 में कताएब की तरफ़ से “तिल ज़अतर” के मुहासरे के दो महीने बाद फ़तह को मजबूरन मैदाने अमल में उतरना पड़ा मगर फ़तह भी कताएब के इस मुहासरे को ख़त्म ना करा सकी। इन हालात में अरमून कांफ्रेंस रखी गई जिस में मुसलमान रहनुमा यासिर अराफ़ात, कमाल जम्बलात, मुफ्ती आज़म अहले सुन्नत शेख़ हसन ख़ालिद, सैय्यद मूसा सद्र, रशीद करामी और साएब सलाम शरीक हुए इस कांफ्रेंस में यह तय पाया कि मूसा सद्र शाम जाएं और बशर अल असद को अपनी सेनाओं में दाख़िल करने पर राज़ी करें। (13)
यहां सही रहेगा कि हम अमल मिलिशिया के संस्थापक डॉ मुस्तफ़ा चमरान का कुछ हाल लिखें। डॉ मुस्तफ़ा चमरान ईरानी थे। आप ने अमेरिका से इलेक्ट्रॉनिक्स और प्लाज़्मा फ़िज़िक्स में डाक्टरेट की डिग्री हासिल की। मध्यपूर्व के खस्ता हालात को नज़र में रखते हुए अपने कुछ मिस्री दोस्तों के साथ आप मिस्र आए और जमाल अब्दुल नासिर के दौर में मिस्र सेहराए सीना में छापा मार जंग की तरबियत हासिल की। जमाल अब्दुल नासिर की मौत के बाद आपने लेबनान का चुनाव किया और इन्क़िलाबे इस्लामी ईरान तक मूसा सद्र के राइट हैंड के तौर पर काम करते रहे। इन्क़िलाबे ईरान के बाद डॉ मुस्तफ़ा चमरान ने ईरान आकर वज़ीर दिफ़ा का क़लमदान संभाला और पासदाराने इन्क़िलाब की तरबियत की। इसी दौरान आप को ईरान की पार्लियामेंट में तेहरान के नुमाइंदे के तौर पर चुना गया। हालांकि आप ज़्यादा देर मैदाने कार ज़ार से दूरी बर्दाश्त ना कर सके और दोबारा फ़ौजी लिबास पहन लिया। 1981 में मैदान में लड़ते हुए आप ने शहादत का जाम पिया। (14)
हिज़्बुल्लाह के बारे में मग़रिबी(पश्चिमी) मीडिया में आम तौर पर यह अफ़वाहें फैलाई जाती हैं कि इस तनज़ीम के जंग जुओं को ईरान में तरबियत दी जाती है जबकि शाम इस तनज़ीम को लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध करता है। (15) इस बारे में तनज़ीम के संस्थापक डॉ मुस्तफ़ा चमरान का बयान पढ़ने वालों के लिये नक़्ल कर दे रहे:
हमारे बेहतरीन ईरानी नौजवानों में से कई सौ ने लेबनान में अमल के इन केन्द्रों में तरबियत हासिल की। (16)
यूनीवर्सिटी आॅफ़ औसलो के छात्र ऐरिक ऐबलिड के हिज़्बुल्लाह पर लिखे जाने वाले थीसिस के मुताबिक़ हिज़्बुल्लाह के समाजी इदारों को ईरान, ईराक़, शाम, बहरीन से मिलने वाली मदद ख़ुम्स, ज़कात और मज़हबी सदक़ात की मद में मिलती है। हालांकि हिज़्बुल्लाह के समाजी मंसूबों के लिए जमा होने वाली बड़ी राशी उन राशियों पर निर्भर होती है जो बाहर देशों में रहने वाले सुन्नी और शिया मुसलमान हिज़्बुल्लाह के सियासी मनशूर से जुड़े ना होने के बावजूद उन्हें भेजते हैं। जिस की केवल एक ही वजह है कि उन्हें हिज़्बुल्लाह पर भरोसा है कि उनकी दी हुई राशी सही मामले में खर्च होगी। लेबनान में यह जुमला अक्सर सुना जा सकता है कि मैं हिज़्बुल्लाह से नफ़रत करता हूँ फिर भी मैं हिज़्बुल्लाह की समाज सेवाओं के कामों की वजह से उनका सम्मान करता हूँ। (17)

मूसा सद्र का अपहरण(किडनैपिंग) :
लीबिया और मूसा सद्र के बीच रिश्ते कुछ बेहतर नही थे। लीबिया के चापलूस गिरोह मूसा सद्र पर तरह तरह के इल्ज़ामात लगाते। मूसा सद्र के अलजज़ाएर के दौरे के दौरान यह राय पेश की गई कि लीबिया और मूसा सद्र के रिश्ते में बेहतरी आनी चाहिए जिसे मूसा सद्र ने क़ुबूल कर लिया और उसके फ़ौरन बाद आप को लीबिया के दौरे की दावत मिल गई। मूसा सद्र 1975 में लीबिया गए और 13 अगस्त 1975 तक लीबिया ही में रहे। उनकी मुलाक़ात कर्नल क़ज़्ज़ाफ़ी से ना हो सुखी तो उन्होंने इरादा किया कि वह वापस लेबनान लौट जाएं। जिसके बाद से लेकर आज तक उनका और उनके हमसफ़रों का कुछ पता नहीं। (18)
मूसा सद्र के इस अपहरण ने लेबनान के अवाम(जनता) ख़ासकर हरकते महरूमीन को एक बार फिर यतीम कर दिया। अमल ख़ाना जंगी के इस दौर में कमज़ोर होती गई। यहां तक कि 1978 में इस्राइल की तरफ़ से लेबनानी सरजमीं पर किये जाने वाले “लैटिनी आॅपरेशन्ज़” ने अमल मिलिशिया की रगों में ताज़ा जोश भर दिया। साथ ही ईरान में आने वाला इन्क़िलाब अमल के जवानों के लिए हरकत की एक मिसाल बन गया। इसी ज़माने में अमल और फ़िलिस्तीनियों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं और दोनों गिरोह एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हो गए। अमल और बासी फ़िलिस्तीनी पार्टियों के बीच होने वाली झड़पें इसी दूरी का नतीजा थी।
इन्क़िलाबे इस्लामी ईरान और हिज़्बुल्लाह मूसा सद्र के तरबियत में नौजवान उलेमा के एक जत्थे ने इस्लामी इन्क़िलाब ईरान से प्रेरित होकर नए जोश के साथ हिज़्बुल्लाह को संगठित किया। 1982 से 1985 तक इस तनज़ीम ने रहस्यमयी तौर पर अपनी सरगरमियां जारी रखीं और 1985 में शहीद राग़िब अल हर्ब की शहादत की दूसरी बरसी के मौक़े पर तनज़ीम ने एक खुले ख़त के ज़रिए दुनिया के सामने अपने आप को पहचनवाया। (19) अमल मिलिशिया जो कि लेबनान में फ़िलिस्तीनियों के बिना वजह हस्तक्षेप की वजह फ़िलिस्तीनियों की मुख़ालिफ़ हो चुकी थी के विपरीत हिज़्बुल्लाह ने मूसा सद्र की राह पर चलते हुए फ़िलिस्तीनियों की हिमायत का बेड़ा उठाया।
आज हिज़्बुल्लाह लेबनान में शियों का सबसे बड़ा और ताक़तवर गिरोह है फिर भी यह नहीं समझना चाहिए कि लेबनान के सारे शिया इस गिरोह का हिस्सा हैं और यह भी वहम है कि हिज़्बुल्लाह सिर्फ़ शियों का गिरोह है। शुरू में अमल मिलिशिया ने हिज़्बुल्लाह को अपना हरीफ़ जाना यही वजह है कि अमल मिलिशिया और हिज़्बुल्लाह के बीच 1980 के दशक में कई झड़पें हुईं जिन पर हिज़्बुल्लाह की बाहोश क़यादत ने वक़्त गुज़रने के साथ क़ाबू पा लिया।

आएं हिज़्बुल्लाह के वुजूद को इस खुले ख़त के ज़रिए समझने की कोशिश करते हैं जो 1985 में हिज़्बुल्लाह के तरजुमान सैय्यद इब्राहीम अमीन ने पेश किया :
हम बुराईयों और मुनकिरात को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए मैदान अमल में आए हैं और हमारा एतक़ाद है कि दुनिया की सारी मुसीबतें और बुराईयां अमेरिका की वजह से हैं। अमेरिका, इस्राइल और फ़्लानजिस्टों के ज़ुल्म के नतीजे में हमारे लगभग एक लाख लोग मारे जा चुके हैं। लगभग पाँच लाख मुसलमान बेघर हो गए। फ़्लानजिस्टों की मदद से इस्राइल लेबनान के एक तिहाई हिस्से पर क़ाबिज़ हो चुका है। हम हिज़्बुल्लाह के फ़रज़न्द अमेरिका, इस्राइल और फ़्लानजिस्टों को ख़ित्ते में अपना हक़ीक़ी दुश्मन मानते हैं।
इसी ख़त में एक जगह लिखा है:
हम उम्मत के फ़रज़न्द हैं। हम एक ऐसी मिल्लत हैं जो इस्लामी क़ानूनों की पाबन्द है। हम इस बात के भी ख़्वाहिश मन्द हैं कि दुनिया भर के मज़लूमीन व महरूमीन इस ख़ुदाई मज़हब को परखें और इस निज़ाम को अपनी ज़िन्दगियों में राएज करें। क्योंकि यही वह मज़हब है जो हक़ीक़ी अदालत, अमन व आशती को दुनिया में पहचनवाता है। फिर भी हम किसी पर भी यह निज़ाम ज़बरदस्ती थोपना नहीं चाहते और इसी बुनयाद पर हम इस बात पर भी राज़ी नहीं हैं कि कोई दूसरा हम पर अपने मज़हब या निज़ाम थोपे। हम सारी अरब मिल्लतों को दावत देते हैं कि ईरान के इस्लामी इन्क़िलाब का अनुभव हम सब के लिए हुज्जत है और किसी के लिए कोई उज़्र नहीं रहा। हम सारी मिल्लतों को दावत देते हैं कि अपनी सफ़ों को एकजुट और मज़बूत करें। कठपुतली हुकूमतों का तख्ता उलटने की शुरू करें। सब मज़लूम मिल्लतें यह यक़ीन कर लें कि सिर्फ़ इस्लाम ही वह वाहिद राह है जो ज़ुल्म व सितम के ख़िलाफ़ रेजिस्टेंस सिखाता है और उसकी राह तय करता है। ऐ मिल्लते इस्लामिया! इस्तेमार के फ़ितनों को और इख़्तिलाफ़ पैदा करने के हरबों को समझो। शिया सुन्नी तास्सुबात को हवा देने वाले अनासिर को पहचानो। अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थामे रहो। वस्सलाम (20)
हिज़्बुल्लाह ने इमानी ताक़त और इस्तेक़ामत की बुनियाद पर सिर्फ़ अठारह साल की कम मुद्दत में, 1948 से बैतुल मुक़द्दस और इस से जुड़े इलाक़ों पर क़ब्ज़ा जमाए इस्राइल जैसे ताक़तवर और अय्यार दुश्मन को अपनी सरजमीं छोड़ने पर मजबूर कर दिया। इस ज़माने में हिज़्बुल्लाह के नौजवानों ने सैंकड़ों बलिदान दिये। सब से बढ़कर यह कि इस तनज़ीम के कई लीडर इस कोशिश के दौरान इस्राइली हमलों का निशाना बने। जिनमें शहीद राग़िब अल हर्ब, शहीद अब्बास मूसवी, और हाज इमाद मुग़निया के नाम क़ाबिले ज़िक्र हैं। 1992 में हिज़्बुल्लाह के सेक्रेटरी जनरल अब्बास मूसवी की शहादत के बाद हसन नसरुल्लाह इस गिरोह के जनरल सेक्रेटरी नामज़द हुए जो अभी भी इस पद पर क़ायम हैं।
लेबनान से इस्राइली फ़ौजों की निकासी ने हिज़्बुल्लाह को अरब में ख़ासकर इस्लामी दुनिया में आम तौर पर मुस्लिम रेजिस्टेंस तहरीक के तौर पर पहचनवाया। हिज़्बुल्लाह की इस अज़ीम कामयाबी ने इस्राइल के किसी से ना हारने वाला रियासत होने का सपना चकना चूर कर दिया। अरब अवाम को भी इस बात का एहसास हुआ कि अगर यह कुछ मुट्ठी भर सिपाही इस्राइल को अपनी सरजमीं से निकाल सकते हैं तो इतने सारे अरब मिलकर इस्राइल को ख़ित्ते से निकाल बाहर क्यों नहीं कर सकते। इस जीत के बाद अरब देशों में कई कांफ्रेंस रखी गईं जिस में हिज़्बुल्लाह के लीडर्स को शामिल होने की दावत दी गई और इस्राइल के बारे में उनके अनुभव को मुल्की मीडिया पर लाया गया। कई अरब देशों ने हिज़्बुल्लाह के नौजवानों को सरकारी दौरों की दावत दी जिसमें सऊदी हुकूमत का हिज़्बुल्लाह के जवानों को हज के लिए बुलाना क़ाबिले ज़िक्र है।
2006 की 34 दिनों चली जंग ने हिज़्बुल्लाह की इस्राइली फ़ौजों पर प्राथमिकता को ज़्यादा मज़बूत किया। इस जंग में इस्राइल ने 2000 की जंग में हुई बेइज़्ज़ती को कम करने और हिज़्बुल्लाह को हमेशा के लिए ख़त्म करने के इरादे से लेबनान की सरज़मीन पर अन्धा – धुंध बमबारी की। इस बमबारी के बाद जब उन्हें तसल्ली हो गई कि अब हिज़्बुल्लाह की मुक़ाबला करने की ताक़त ना के बराबर रह गई है तो उन्होंने अपनी फ़ौजों को लेबनान में दाख़िल कर दिया। यही वह वक़्त था जिस का हिज़्बुल्लाह के जवानों को इन्तज़ार था। हिज़्बुल्लाह के हथियारबंद जंगियों ने इस्राइली टैंकों और बकतर बन्द गाड़ियों को अपने राॅकेटों के निशाने पर रख लिया। दुश्मन बौखला गया और वक़्त का इस्राइली प्रधानमंत्री यह कहने पर मजबूर हो गया कि इस वक्त लेबनान में फ़ौज को दाख़िल करना हुकूमत की बहुत बड़ी ग़लती थी। हिज़्बुल्लाह ने इस्राइल के सरहदी देहातों पर जहां इस्राइली फ़ौजें ख़ेमा लगाए थीं, राॅकेटों की बरसात कर दी। इस जंग के दौरान मग़रिबी सोर्स के मुताबिक़ 158 इस्राइली फ़ौजी मारे गए और सैकड़ों की संख्या में घायल हुए, इसके अलावा माली नुक़सान भी हुआ। (21)
इस जंग में लेबनानी अवाम को भी बहुत नुक़सान हुआ, फ़िर भी हिज़्बुल्लाह ने लेबनानी अवाम के कन्धे से कन्धा मिलाकर उनके घरों का निर्माण, मरम्मत, खान-पान दवाइयों और बाक़ी ज़िन्दगी की ज़रूरतों का ख़याल रखा। यही वजह है कि हिज़्बुल्लाह आज लेबनान में सबसे बड़ी ताक़त के तौर जाना जाता है।

फ़िक्री राह और जंगी हिकमत ए अमली :
हिज़्बुल्लाह एक ऐसा गिरोह है जिसमें शिया नौजवान ज़्यादा हैं। जैसा कि ऊपर लिखे मनशूर के नक़्ल से ज़ाहिर है कि यह लोग अब आप को मुस्लिम समुदाय का एक हिस्सा मानते हैं और दीने इस्लाम की सरबुलन्दी को अपना सबसे पहला मक़सद जानते हैं। यह लोग क़ुरआन व सुन्नत के साथ विलायते फ़क़ीह के नज़रिये के भी क़ायल हैं। हिज़्बुल्लाह के तनज़ीमी व ग़ैर तनज़ीमी फ़ैसलों में वली ए फ़क़ीह को तमाम फ़ैसलों पर प्राथमिकता हासिल है। तनज़ीम का जनरल सेक्रेटरी वली ए फ़क़ीह का नुमाइंदा माना जाता है। जिस का चुनाव हिज़्बुल्लाह की केन्द्रीय कमेटी करती है। नब्बे के दशक में हिज़्बुल्लाह ने लेबनान के दूसरे मकातिब और मसालिक के लिए तनज़ीम में विशेष वर्ग(सेक्टर) बनाए जिन में शामिल होकर दूसरे लेबनानी भी इस तहरीक के हिस्सा बन सकते हैं। हिज़्बुल्लाह ख़ित्ते में क़ुद्स की आज़ादी का सबसे बड़ा लश्कर है। यही वजह कि इस्राइल की नाबूदी और क़ुद्स की आज़ादी के लिये काम करने वाले सारे गिरोहों और लोगों से हिज़्बुल्लाह के बहुत अच्छे रिश्ते हैं। हिज़्बुल्लाह ख़ित्ते में हमास का सब से बड़ा समर्थक गिरोह है। जबकि इस्राइल को यह गिरोह काँटे की तरह चुभती है। इस तनज़ीम को इस्राइल नवाज़ मग़रिबी देशों ने कई अंतरराष्ट्रीय फ़ोरम पर दहशतगर्द तनज़ीम का दर्जा दिलाया, जिन में युनाइटेड नेशन, यूरोपीय यूनियन और नाटो क़ाबिले ज़िक्र हैं फ़िर भी अक्सर मुस्लिम व ग़ैर मुस्लिम देश इस तनज़ीम को बाक़ायदा रेजिस्टेंस तहरीक का दर्जा भी देते हैं। हिज़्बुल्लाह का जिहाद दो तरफ़ा है वह इस्राइल और उसके साथियों के ख़िलाफ़ जिहाद को जिहादे असग़र और अपने देश में मौजूद ना-इन्साफ़ियों, करप्शन, भाई – भतीजावाद और फ़िरक़ा वारियत के ख़िलाफ़ जिहाद को जिहादे अकबर मानते हैं।
हिज़्बुल्लाह का अस्करी गिरोह इस्लामिक रेजिस्टेंस छापामार कार्यवाहियों में महारत रखता है। फिर भी 2006 की 34 दिनों तक चली जंग में इस गिरोह ने पूरी दुनिया से अपनी दूसरी अस्करी महारतों का भी लोहा मनवाया। इन का सबसे पहला मक़सद हमेशा फ़ौजी प्रतिष्ठान और हथियारबंद लोग ही रहे हैं। 1982 से इस्राइल के लेबनान पर क़ब्ज़े के वक़्त तक हिज़्बुल्लाह ने कई खुदकश हमले किये जिस में इस्राइली चौकियों, फ़ौजी काफ़िलों और अस्करी आॅफ़िसों को निशाना बनाया गया, फिर भी, 2000 में इस्राइली फ़ौजों के लेबनान से निकलने के बाद ख़ुदकश हमलों का सिलसिला रोक दिया गया। (22) अल-क़ायदा की तरफ़ से वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर हमले और आम शहरियों के क़त्ल की हिज़्बुल्लाह ने सख्त अल्फाज़ में निंदा की, फिर पेंटागन के बारे में हिज़्बुल्लाह चुप रहा। (23) हिज़्बुल्लाह ने अल्जीरिया के जिहादी गिरोह की तरफ़ अल्जीरिया के लोगों के क़त्लेआम की सख्त अल्फाज़ में निंदा की, इसी तरह मिस्र में पर्यटकों की बसों पर जमाते-इस्लामिया के हमलों पर भी हिज़्बुल्लाह की लीडरशिप की तरफ़ से निंदा के बयान आते रहे। (24)

हिज़्बुल्लाह और मध्यपूर्व की मौजूदा वक़्त की बेदारी :
हिज़्बुल्लाह अरब दुनिया में क़ायम निज़ाम को शुरू ही से नाकाम निज़ाम मानती है। 1985 में जारी किये हिज़्बुल्लाह के घोषणापत्र में दर्ज है :
अरब दुनिया का वह निज़ाम जिस ने सैहूनी हुकूमत से सुलह को प्राथमिकता दी बुरी तरह नाकाम हो चुका है। इस के लीडर उम्मत की ख़्वाहिशात और आरज़ुओं को पूरा नहीं कर सकते। यह फिलिस्तीन के ग़ासिबों और क़ाबिज़ीन से जंग का ख़याल भी नहीं कर सकते। यह नहीं देखते कि उनके देश, अमेरिका और ब्रिटेन के फ़ौजी केन्द्रों में बदल चुके हैं। अमेरिका के सामने सर झुकाना और उसकी वजह पेश करते हुए शरियत का लबादा ओढ़ना आम हो चुका है। यह अरब निज़ाम अवाम को जिहालत और गुमराही में रखे हुए है। यह अरब अवाम में उठने वाली हर उस तहरीक को जो अमेरिका और उसके साथियों के ख़िलाफ़ हो दबा देते हैं और इस चीज़ से बेहद डरते हैं कि ऐसा ना हो कि अवाम अपने हुक़ूक़ के लिए आवाज़ उठाए या सियासी मामलों में दख़्ल दे। हम सारी मिल्लतों को दावत देते हैं कि अपनी सफ़ों को एकजुट और मज़बूत करें। कठपुतली हुकूमतों का तख़्ता उलटने की शुरूआत करें। (25)
हिज़्बुल्लाह की 1985 में दी गई दावत आज अरब मिल्लतों को समझ आई और उन्होंने 2011 में अपने सफ़र की शुरूआत की। अब ख़ुदा जाने कि यह सफ़र कब अपनी मंज़िल तक पहुंचेगा हालांकि हिज़्बुल्लाह इस मौक़े पर भी अरब मिल्लतों की पुश्त पर मौजूद है और उनको कामयाबी का वायदा दे रही। मिस्र में होने वाली मौजूदा तहरीक पर हिज़्बुल्लाह के जनरल सेक्रेटरी हसन नसरुल्लाह ने कहा :
हम हरगिज़ आप के देश के अन्दर के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते क्योंकि आप बेहतर जानते हैं कि इन नाज़ुक हालात में आप को क्या करना चाहिए। लेकिन यह जान लीजिए कि हम अपने आप को आप की सफ़ों में शामिल समझते हैं और आप से किसी सूरत भी जुदा नहीं हैं। मैं बेरुत में बैठ कर आप जवानों से कहना चाहता हूँ कि काश मैं भी इस वक़्त आप के हमराह मैदान में होता। अगर मुमकिन होता तो मैं इस के लिए आमादा था कि मिस्र की अवाम के मक़सदों के हासिल करने के लिए अपने ख़ून की क़ुरबानी पेश करता। (26)
बहरीन में खाड़ी देशों की फ़ौजों के दाख़िले और अवाम की बेदारी की इस लहर को फ़िरक़ा वाराना रंग देने पर हसन नसरुल्लाह से चुप ना रहा गया और आप ने लेबनान के सुन्नी और शिया उलेमा से बातचीत करते हुए कहा:
बहरीन एक छोटा सा जज़ीरा है जिस की कुल आबादी दस लाख लाख लाख है। इस जज़ीरे के मज़लूम अवाम ने अपने जाएज़ हुक़ूक़ के लिए जब प्रोटेस्ट(आन्दोलन) का रास्ता चुना तो उनकी हुकूमत ने उसका जवाब गोलियों और क़त्ल ग़ारत से दिया। बहरीन की यह तहरीक एक क़ौमी तहरीक है उसका मज़हबी फ़िरक़ा वारियत से कोई ताल्लुक़ नहीं। वह हकूमतें जिन्होंने बहरीन में जारी ज़ुल्म व सितम पर चुप्पी बनाई रखी है इन से पूछा जाना चाहिए कि आप क्यों चुप हैं? क्या आप की चुप्पी की वजह यह है कि बहरीन में प्रोटेस्ट करने वाले मज़लूम अवाम शिया समुदाय से ताल्लुक़ रखती हैं? क्या बहरीन में शिया अकसरियत होने का मतलब यह है कि उनका ख़ून बहाना सही है? हम ने हमेशा फ़िलिस्तीनी रेजिस्टेंस की हिमायत की हे और कभी यह नहीं सोचा कि उनका मसलक क्या है? (27)
आज हिज़्बुल्लाह अरब-दुनिया में ना सिर्फ़ रेजिस्टेंस की निशानी है बल्कि लेबनान में यह गिरोह विफ़ाक़(इत्तेहाद, एकता) का सच्चा तसव्वुर है।
लेबनान में हिज़्बुल्लाह वह अकेला गिरोह है जिसने लेबनान की अवाम को फ़िरक़ा वाराना बुनियादों से दूर एक देश का तसव्वुर दिया है। इस तनज़ीम ने इन्सानी बुनियादों पर लेबनानियों को सहारा दिया। हिज़्बुल्लाह ही की वजह से लाखों लेबनानी मुहाजिरीन(रिफ्यूजी) अपने वतन को लौटे। ऐरिक एबलिड ने हिज़्बुल्लाह पर अपने थीसिस के अन्त में एक लेबनानी रिफ्यूजी किसान क़ासिम से इस विषय पर सवाल पूछा कि हिज़्बुल्लाह ने उसे क्या दिया है?
क़ासिम की तरफ़ से दिया जाने वाला जवाब पढ़ने वालों के लिए लिख रहे।
“हिज़्बुल्लाह ने ही मुझे इस क़ाबिल बनाया है कि मैं आप को अपने घर बुला सकूं यह हिज़्बुल्लाह ही का करिश्मा है कि मेरा बेटा इसी सरज़मीन पर परवरिश पर रहा है जहां मै जवान हुआ। यह हिज़्बुल्लाह की वजह से है कि मेरा बेटा इन ज़ैतून के पेड़ों के दरमियान खेल रहा है। (28)

हवाले :

1: CNN (July 25, 2006). “Hezbollah’s secret weapon”. Retrieved July 25, 2006. विकिपीडिया से नक़्ल
2: लेबनान, डॉ मुस्तफ़ा चमरान, इमामिया पब्लिकेशन, पेज नम्बर 46
3: लेबनान, डॉ मुस्तफ़ा चमरान, इमामिया पब्लिकेशन, पेज नम्बर 46

4: Hezbollah Richard Norton : Princeton University Press © 2007, P 15
5: Hezbollah Richard Norton : Princeton University Press © 2007, P 18
6: Hezbollah Richard Norton : Princeton University Press © 2007,P 20
7: लेबनान, डॉ मुस्तफ़ा चमरान, इमामिया पब्लिकेशन, पेज नम्बर 101
8: लेबनान, डॉ मुस्तफ़ा चमरान, इमामिया पब्लिकेशन, पेज नम्बर 92
9: Hezbollah Richard Norton : Princeton University Press © 2007,P 21
10: लेबनान, डॉ मुस्तफ़ा चमरान, इमामिया पब्लिकेशन, पेज नम्बर 169
11: लेबनान, डॉ मुस्तफ़ा चमरान, इमामिया पब्लिकेशन, पेज नम्बर 102
12: लेबनान, डॉ मुस्तफ़ा चमरान, इमामिया पब्लिकेशन, पेज नम्बर 186
13: लेबनान, डॉ मुस्तफ़ा चमरान, इमामिया पब्लिकेशन, पेज नम्बर 361, 356
14: लेबनान, डॉ मुस्तफ़ा चमरान, इमामिया पब्लिकेशन, पेज नम्बर 448
15: Frykberg, MelL (August 29, 2008). “Mideast Powers, Proxies and Paymasters Bluster and Rearm”. Middle East Times. Retrieved August 29, 2008. विकिपीडिया से नक़्ल
16: लेबनान, डॉ मुस्तफ़ा चमरान, इमामिया पब्लिकेशन, पेज नम्बर 102
17: Erik AbildThesis in Development Studies – University of Oslo P 27
18: लेबनान, डॉ मुस्तफ़ा चमरान, इमामिया पब्लिकेशन, पेज नम्बर 390
19: “Who are Hezbollah”. BBC News. May 21, 2008. Retrieved August 15, 2008. विकिपीडिया से….
20: “The Hizballah Program” (PDF). provided by standwithus. com (StandWithUs). Retrieved October 29, 2007. विकिपीडिया से…..
21: Deeb, Lara (July 31, 2006). “Hizballah: A Primer”. Middle East Report. Retrieved July 31, 2006. विकिपीडिया से….
22: “Timeline of Hezbollah operations”. Camera.org. Retrieved 2011-01-27. विकिपीडिया से….
23: Wright, Robin. “Inside the Mind of Hezbollah”. The Washington Post. Retrieved August 1, 2006. विकिपीडिया से…..
24: Hezbollah’s condemnation of murder of civilians in Egypt and Algeria is described in Saad-Ghorayeb, p. 101. विकिपीडिया से
25: “The Hizballah Program” (PDF). provided by standwithus. com (StandWithUs). Retrieved October 29, 2007.
26: http://shiacenter.org/urdu/index.php?option=com_content&view=article&id=2290:2011-
27: http://www.islamtimes.org/prthi-n-.23nvidl4t2.html
28: Erik AbildThesis in Development Studies – University of Oslo P45
………….

लेखक : आदिल अब्बास

नोटः इस निबन्ध का लिखना आसान नही था बिना “सिबतैन डाट काम” पर मौजूद जानकारी व हवालों के बिना जो हमें शेख़ अनसारियान की वेबसाइट से मिली। हम अपने दोस्त व बड़े भाई जैसे वक़स आवान साहब के शुक्र गुज़ार हैं जिनकी वजह से हमें इस वेबसाइट का लिंक मिला।

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