विलायत ए फ़क़ीह क़ुरआन की रौशनी में

विलायत ए फ़क़ीह क़ुरआन की रौशनी में

इस्लामी हुकूमत का सरबराह फ़क़ीह होने की ज़रूरत, ख़ुद इस्लामी हुकूमत की मुनफ़रद नोइयत मुशतरका उमूमी हदफ़ और उसके आला मक़ासिद से अयां होती है।
इस्लामी हुकूमत का मक़सद मुसलमानों को सिर्फ़ माद्दा और माद्दा परस्ती में घेरे रखना या सिर्फ़ रूहानी पहलू में बन्द करके हलाल और जाएज़ माद्दी लज़्ज़तों से महरूम करना नहीं बल्कि इसके पेश नज़र रूहानी तरक़्क़ी और मक़सदे ख़िलक़त की तरफ़ इन्सान को बढ़ाने के लिए माद्दी उमूर को मुक़द्दमा और तमहीद के तौर पर इस्तेमाल करना है।
ऊपर ज़िक्र हुए मक़सद की तकमील के लिए एक ऐसे रहबर की रहबरी की ज़रूरत है जो ख़ुद उस स्तर(दर्जा) और पैमाने का आला नमूना हो।
दूसरी तरफ़ इस्लाम का निज़ाम, इस्लाम का ख़ुद साख़्ता नहीं है बल्कि अल्लाह तआला के नाज़िल करे अहकाम हैं जो क़ुरआन करीम, शरीयते मुहम्मदिया और आप(स) की आल(अस) की बयान की हुई अहादीस की शक्ल में मौजूद हैं हैं और जिन का समझना हर इन्सान के बस में नहीं है।
अहकामे इलाहिया को सिर्फ़ चन्द अफ़राद ऐसे अफ़राद समझ सकते हैं जिन्होंने अपना ओढ़ना बिछौना अहकाम को समझना क़रार दिया हो और अहकाम को समझने में पूरी महारत रखते हों।
क़ुरआन करीम के नज़दीक हुकूमते इस्लामी के सरबराह के शरायत क्या हैं? क्या हर शख़्स को हाकिम तसव्वुर किया जाना दुरुस्त है?
इस्लामी हुकूमत की सरबराही के लिए क़ुरआन करीम चन्द शरायत लाज़मी क़रार देता है।

1: इमान और तक़वा
क़ुरआन करीम की काफ़ी आयात पर तहक़ीक़(जाँचना) करने और उन्हें एक दूसरे से मिला कर देखने से हरगिज़ यह नतीजा नहीं निकलता कि इस्लामी हुकूमत में हर शख़्स हाकिमे आला के मनसब को प्राप्त कर सकता है बल्कि इसके विपरीत हाकिमे आला के लिए बाइमान, मुत्तक़ी, बाअमल, अहले-इल्म और साहिबे-बसीरत होना ज़रूरी है।

يَرْفَعِ اللَّـهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ
जो लोग तुम में से इमानदार हैं और जिन को इल्म अता हुआ है ख़ुदा उनके दरजे बुलन्द करेगा।
(मुजादला, 11)

هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ
भला कहीं जानने वाले और ना जानने वाले लोग बराबर हो सकते हैं।
(ज़ुमर, 9)

أَجَعَلْتُمْ سِقَايَةَ الْحَاجِّ وَعِمَارَةَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ كَمَنْ آمَنَ بِاللَّـهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ
क्या तुम लोगों ने हाजियों की सक़्क़ाई और मस्जिद उल हराम (ख़ाना ए काबा) की आबादी को उस शख़्स के हमसर बना दिया है जो ख़ुदा और रोज़े अाख़िरत पर इमान लाया। (तौबा, 19)

पहली आयत की रौशनी में क़ुर्ब व मनज़िलत(ख़ुदा के क़रीब उच्च स्तर) और दरजात में बुलन्दी का मापक इमान और इल्म को क़रार दिया गया है। वाज़ेह है कि जो शख़्स इस्लामी मापदंडों के मुताबिक़ अल्लाह के नज़दीक किसी ख़ास मक़ाम और दरजे पर होगा तो वह शख़्स बाक़ी अफ़राद से ज़्यादा क़ाबिले-इत्तेबा(यानी जिसके हुक्म के मुताबिक़ अमल हो) होगा। और ऐसे शख़्स की हिदायत और रहबरी में रूहानी लिहाज़ से एक ऐसा सुकून व इत्मिनान भी बन्दगाने ख़ुदा को हासिल होता है जो दूसरों से हासिल नहीं होता।

أَفَمَن يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ أَحَقُّ أَن يُتَّبَعَ أَمَّن لَّا يَهِدِّي إِلَّا أَن يُهْدَىٰ ۖ فَمَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ
जो शख़्स दीने हक़ की राह दिखाता है क्या वह ज़यादा हक़दार है कि उस के(हुक्म की) पैरवी की जाए या वह शख़्स जो(दूसरे की हिदायत तो दरकिनार) ख़ुद ही जब तक दूसरा उसको राह ना दिखाए वह राह देख नहीं पाता, तो तुम लोगों को क्या हो गया है, तुम कैसे हुक्म लगाते हो?
(यूनुस, 35)

ऐसा शख़्स मज़बूत इमान से मालामाल होता है और उस के इमान की बुनियाद इल्म व मारेफ़त और फ़हम व फ़िरासत पर होती है, इस लिए यह इमान ग़ैर-मुताज़लज़िल(जो डगमगाता ना हो) और मज़बूत साबित होता है।

“मोमिन पहाड़ की तरह(मज़बूत) होता है, जिसे ना आन्धी हिला सकती है ना तूफ़ान से उसमें तज़लज़ुल(डगमगाहट) आ सकता है।”
ऐसे अफ़राद का इमान बज़ाते ख़ुद मज़बूत और ग़ैर मुताज़लज़िल(जो डगमगाता ना हो) होने के साथ साथ दूसरे मुक़तदियों(पैरवी करने वाले) की रहनुमाई का भी बाएस बनता है, यानी ऐसा शख़्स दूसरों के लिए इस्लामी अहकाम और फ़रामीन का एक अमली नमूना बनकर ज़ाहिर होता है। इस बेहद मज़बूत इमान वाले शख़्स से मिल्लते इस्लामिया को यह इत्मिनान और क़लबी सुकून मयस्सर आता है कि यह उम्मते इस्लामिया के सियासी(राजनीतिक), इक़तेसादी(आर्थिक) , सक़ाफ़ती(कल्चर) मफ़ादात(फ़ाएदे) पर कभी सौदाबाज़ी नहीं करेगा और कभी भी मिल्लते इस्लामिया को नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं करेगा, बल्कि उसे हर होने वाले फ़सादों के ख़तरे और बदउनवानियों से बचाने की कोशिश करता रहेगा। क्योंकि यह उसके क़वी(मज़बूत) इमान का तक़ाजा और इस्लामी उसूल के मुताबिक़ फ़रीज़ा भी है।

इसके बरअक्स अगर कोई गुमनाम, ग़ैर मोतबर, ना-क़ाबिले एतबार, मफ़ाद परस्त, हवा व हवस का दिलदादा, लालची, कीना-परवर, और शोहरत तलब शख़्स हाकिमे आला के मनसब पर फ़ाएज़ हो जाए तो इन दोनों में से कौन लाएक़ व सज़ावार पैरवी है?

أَفَمَن يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ أَحَقُّ أَن يُتَّبَعَ أَمَّن لَّا يَهِدِّي إِلَّا أَن يُهْدَىٰ ۖ فَمَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ
जो शख़्स दीने हक़ की राह दिखाता है क्या वह ज़्यादा हक़दार है कि उसके(हुक्म की) पैरवी की जाए या वह शख़्स जो(दूसरे की हिदायत तो दरकिनार) ख़ुद ही जबतक दूसरा उसको राह ना दिखाए वह राह देख नहीं पाता, तो तुम लोगों को क्या हो गया है, तुम कैसे हुक्म लगाते हो? (यूनुस, 35)

इस अायाए शरीफ़ा में उन दो अफ़राद के दरमियान तक़ाबुल(तुलना) किया गया है :
1: वह जो दूसरों को हिदायत करना तो दूर ख़ुद मोहताज ए हिदायत हैं
2: वह शख़्स जो हिदायत याफ़ता होने के साथ-साथ दूसरों की हिदायत करने की भी सलाहियत रखता है।
इन दोनों को एक ही क़तार में खड़ा करना ग़ैर मनतक़ी अमल है, क्योंकि जो शख़्स ख़ुद हिदायत याफ़ता नही है या ख़ुद हिदायत याफ़ता और नेक तो है लेकिन दूसरों को हिदायत देने की सलाहियत नहीं रखता तो वह मिल्लते इस्लामिया को क्या दे सकता है?
इसी से दूसरा पहलू रोज़े रौशन की तरह अयां हो जाता है कि जब ऐसे अफ़राद के दरमियान तक़ाबुल किया जाए जिनमें से एक हादी-ए-उम्मत और रहबरी के तमाम औसाफ़ और शरायत का मालिक है और दूसरा बज़ाते ख़ुद जाहिल और बद-उनवान हो, जैसा कि मौजूदा दौर में ज़्यादातर देशों के लीडर और बड़े बड़े नेता जिहालत व नादानी का शिकार होने के साथ-साथ फ़िरऔनियत और शहनशाहियत के नशे में मस्त हैं। तो उन में से कौन हादी व रहबर बनने का अहल होगा?
बहरहाल यह एक हक़ीक़त है कि ख़ुदावन्दे आलम के नज़दीक वही लोग मोहतरम व मुकररम(इज़्ज़तदार) होते हैं जो इमान और तक़वा-ए- ख़ुदावन्दी में डूबे हुए हों।

إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّـهِ أَتْقَاكُمْ
इस में शक नहीं कि ख़ुदा के नज़दीक तुम सब में बड़ा इज़्ज़तदार वही है जो बड़ा परहेज़गार है।
(हुजरात, 13)

क़ुरआनी आयात की रौशनी में यह भी एक हक़ीक़त है कि अल्लाह तआला का बड़ा फ़ज़्ल व करम, ख़ास तौफ़ीक़ और ताईद मोमिनीन के शामिले हाल होती है इस बारे में चन्द आयात मुलाहिज़ा फ़रमाएं :

إِنَّهُمْ فِتْيَةٌ آمَنُوا بِرَبِّهِمْ وَزِدْنَاهُمْ هُدًى
वह चन्द जवान थे कि अपने(सच्चे) परवरदिगार पर इमान लाए थे और हम ने उन की सोच, समझ और ज़्यादा कर दी। (कहफ़, 13)

وَيَزِيدُ اللَّـهُ الَّذِينَ اهْتَدَوْا هُدًى
और जो लोग राहे रास्त पर हैं ख़ुदा उन की हिदायत और ज़्यादा करता जाता है। (मरयम, 76)

وَالَّذِينَ اهْتَدَوْا زَادَهُمْ هُدًى وَآتَاهُمْ تَقْوَاهُمْ
और जो लोग हिदायत याफ़ता हैं उन को ख़ुदा(क़ुरआन के ज़रिये से) मज़ीद हिदायत करता है और इनको परहेज़गारी अता करता है। (मुहम्मद, 17)

मर्द मोमिन का क़वी इमान इस का बाएस बनता है कि ख़ुदावन्दे आलम उस को मज़ीद तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और इमान की नयी मंज़िलें तय करने के लिए इसकी ख़ास तौर पर रहनुमाई फ़रमाए और इस तरह उस का हर पहला क़दम, दूसरा क़दम उठाने के लिए मददगार बन जाता है जैसा कि इरशाद ख़ुदावन्दे आलम है :

وَمَن يَتَّقِ اللَّـهَ يَجْعَل لَّهُ مَخْرَجًا
और जो ख़ुदा से डरेगा तो उसके लिए निजात की सूरत निकाल देगा। (अत-तलाक़, 2)

मुत्तक़ी के सामने हर क़िस्म के मसाएल का सही तौर पर हल मौजूद और वाज़ेह होता है और वादा ख़ुदावन्दी के मुताबिक़ हक़ और बातिल के दरमियान ख़ुसूसी तौर पर उस के पास मापदंड और दर्जा होता है, अगर से वह ख़ुद आदी उसूल के मुताबिक़ इस मानवी(रूहानी) रिज़्क़ के सरचशमे और कैफ़ियत से नाआशना होता है मगर वह अनजाने तौर पर उस से भरा रहता है, तौफ़ीक़ व इनायत-ए-इलाही उसके शामिले हाल होती रहती है और यह शख़्स क़ुरआन के अलफ़ाज में सालेह बन्दा भी है।

अल्लाह तआला ने इस के साथ यह वादा भी कर रखा है कि वह इस को ज़मीन का वारिस बनाएगा।

وَعَدَ اللَّـهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِي الْأَرْضِ كَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ
(ऐ इमानदारों!) तुम में से जिन लोगों ने इमान लाया और अच्छे अच्छे काम किए उन से ख़ुदा ने वादा किया है कि उन्हें(एक ना एक दिन) रूए ज़मीन पर ज़रूर (अपना) नाएब मुक़ररर(चुन्ना, बनाना) करेगा जिस तरह उन लोगों को नाएब बनाया जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं। (नूर, 55)

وَلَقَدْ كَتَبْنَا فِي الزَّبُورِ مِن بَعْدِ الذِّكْرِ أَنَّ الْأَرْضَ يَرِثُهَا عِبَادِيَ الصَّالِحُونَ
और हम ने तो नसीहत(तौरैत) के बाद यक़ीनन ज़ुबूर में लिख ही दिया था कि रूए ज़मीन के वारिस हमारे नेक बन्दे होंगे। (अल अम्बिया, 105)

इस लिए एक मुत्तक़ी और बाइमान की बजाए एक ऐसे शख़्स को किस तरह मुनतक़ब(चुना) किया जा सकता है जिस का इमान और तक़वा कमज़ोर हो या सिरे से ही ना हो, और ऐसे शख़्स पर मिल्लते इस्लामिया का विश्वास किस तरह क़ाएम हो सकता है जिस में अपने नफ़्स पर एतमाद(विश्वास) करने के लिए सरमाया(इमान) मौजूद ना हो।

ख़ुलासा

इस्लामी हुकूमत के हाकिमे आला की पहली शर्त “इमान और तक़वा” का ख़ुलासा यह हुआ।
1) ख़ुदावन्दे आलम के शरीयत बनाने वाला होने पर इमान रखता हो, यानी वह इस अक़ीदे का मालिक हो कि बनी नूअ इन्सान की तनज़ीम ज़िन्दगी के लिए क़ानून बनाने वाला ख़ुदा ही है बिल्कुल इसी तरह जिस तरह कि वह ख़ालिक़ भी है।
2) उसका इमान हो कि इस्लाम का क़ानून एक हर जगह व हालात में और हमेशा बाक़ी रहने वाला निज़ाम है।
3) अपने नफ़्स पर इमान हो, यानी एक इस्लामी फ़रीज़ा समझ कर इस्लामी क़वानीन नाफ़िज़ करने और उसके लिए अमली इक़दाम करने की ज़रूरत का एहसास होने के साथ-साथ उसे अपनी सलाहियत व क़ाबलियत पर भी भरोसा हो।

2) इल्म

क़ुरआन करीम में इल्म की बरतरी और उसका बुलन्द मुकाम निहायत वाज़ेह है।

هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ
भला कहीं जानने वाले और ना जान ने वाले लोग बराबर हो सकते हैं। (ज़ुमर, 9)

يَرْفَعِ اللَّـهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ
दो लोग तुम में से इमानदार हैं और जिन को इल्म अता हुआ है ख़ुदा उनके दर्जे बुलन्द करेगा। (मुजादला , 11)

وَعَلَّمَ آدَمَ الْأَسْمَاءَ كُلَّهَا ثُمَّ عَرَضَهُمْ عَلَى الْمَلَائِكَةِ فَقَالَ أَنبِئُونِي بِأَسْمَاءِ هَـٰؤُلَاءِ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ ﴿٣١﴾ قَالُوا سُبْحَانَكَ لَا عِلْمَ لَنَا إِلَّا مَا عَلَّمْتَنَا ۖ إِنَّكَ أَنتَ الْعَلِيمُ الْحَكِيمُ ﴿٣٢﴾
और(आदम की हक़ीक़त ज़ाहिर करने की ग़र्ज़ से) आदम को सब चीज़ों के नाम सिखा दिए फिर उनको फरिश्तों के सामने पेश किया और फ़रमाया के अगर तुम अपने दावे में(कि हम ख़िलाफ़त के मुसतहिक़ हैं) सच्चे हो तो मुझे उन चीज़ों के नाम बताओ(तब फरिश्तों ने आजज़ी से) अर्ज़ की तू(हर ऐब से) पाक है हम तो जो कुछ तूने बताया है उसके सिवा नहीं जानते। (बक़रा, 31, 32)

أَفَمَن كَانَ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّهِ وَيَتْلُوهُ شَاهِدٌ مِّنْهُ
तो क्या जो शख़्स अपने परवरदिगार की तरफ़ से दलीले रौशन पर हो और उस के पीछे उन्ही का एक गवाह हो। (हूद, 17)

दूसरी तरफ़ क़ानूने इस्लाम पर उबूर हासिल करने की शर्त ज़रूरते अक़ली में शुमार की जाती है और इस शर्त का पता उस मक़सूस वाक़िये से भी चलता है जो बनी-इसराइल में रूनुमा हुआ।

وَزَادَهُ بَسْطَةً فِي الْعِلْمِ وَالْجِسْمِ
और(माल में ना सही) मगर इल्म और जिस्म का फैलाव तो उसी ख़ुदा ने ज़्यादा फ़रमाया है।
(बक़रा, 247)

हर उस चीज़ के बारे में इल्म होना ज़रूरी है जिस का ताल्लुक़ क़ानून नाफ़िज़ करने से हो और इस शर्त(इल्म) के साथ-साथ क़ुदरत और शुजाअत का होना भी ज़रूरी है ताकि दुश्मनाने इस्लाम और किसी की तान व तशनी और उनके ख़ौफ़ व हिरास की परवाह किये बग़ैर वह अपने फ़रीज़े की अन्जाम देही में मसरूफ़ अमल रहे।
चूंकि यह शर्त बज़ाते ख़ुद वाज़ेह है इस लिए इस पर ज़्यादा बहस करना मुनासिब नहीं है लिहाज़ा सिर्फ़ दो निकात का ज़िक्र करके इस बहस को ख़त्म करते हैं।
1) इस्लामी क़वानीन का इल्म
2) हर दौर के तक़ाज़ों के मुताबिक़ इल्मी दसतरस हासिल होना।

इसकी मज़ीद तशरीह फ़क़ीह के शरायत के ज़िम्न में की जाएगी।
दूसरी तरफ़ इस्लाम के नुक्ता निगाह से बासलाहियत अफ़राद की इताअत लाज़िम ना हो तो क्या ग़ैर सालेह अफ़राद की पैरवी जाएज़ होगी? जिन में ज़ालिम और मुनाफ़िक़ भी शामिल हैं।
क्या इस्लाम के नज़दीक बनी नू इन्सान की ज़िंदगी को मुनज़्ज़म करने और बक़ाए बाहमी के लिए हुकूमत की ज़रूरत नहीं है? अगर ज़रूरत है तो क्या उसका हाकिमे आला एक नाक़िस शख़्स होना चाहिए या उसके लिए मुआशरे के सबसे आला और कामिल शख़्स को मुनतक़ब करना चाहिए?
ज़ाहिर है इस्लामी हुकूमत की ज़रूरयात पर ज़ोर भी देना और कामिल शख़्स की मौजूदगी में ग़ैर कामिल और ग़ैर सालेह अफ़राद की पैरवी भी नहीं करनी।
इस लिए कामिल और लाएक़ तरीन शख़्स वह है जो इल्म और अमल दोनो एतबार से मुआशरे के तमाम अफ़राद से नुमायां मक़ाम पर फ़ाएज़ हो। यह शख़्स दूसरे लफ़्जों में फ़क़ीह जामे शरायत ही हो सकता है और बस।

इस बहस के ख़ात्मे पर उन चन्द रिवायात का ज़िक्र करना मुनासिब है जिस से हाकिमे इस्लामी की अाम शरायत का पता चलता है।

हुकमरान के औसाफ़ रिवायात की रौशनी में

अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अस) ने फ़रमाया :
أيها الناس انّ احق الناس بهذاالامر اقواهم عليه و اعلم بأمر الله
ऐ लोगों! बेशक वही शख़्स इस अम्र (ख़िलाफ़त व हुकूमत) का मुसतहिक़ है जो सब से ज़्यादा क़ुदरत और इल्म का हामिल हो। (नहजुल बलाग़ा, ख़ुतबा 177/ अलहयात, जिल्द 2, पेज 384)

لا يصلح الحكم و لا الجمعة الّا لأمام عدل
इमाम(रहबर) आदिल के बग़ैर(किसी से भी) हुक्म(हुकूमत) हुदूद(ताज़ीरात) और जुमा दुरुस्त नहीं है। (दआएमुल इस्लाम, जिल्द 1, पेज 184/ बिहार बा हवाला अलहयात, जिल्द 2, पेज 384)

اتقوا الله و اطيعوا امامكم فأن الرعيّة الصّالحة تنحوا بأمام العادل الّا وانّ الرّعيّة الفاجرة تهلك بالأمام الفاجر
अल्लाह से तक़वा इख़्तियार करो और अपने इमाम(रहबर) की इताअत करो, बेशक सालेह رعیت की निजात इमामे आदिल(की इताअत) में मुज़मर है। आगाह रहो कि फ़ाजिर رعیت, फ़ाजिर इमाम के सबब हलाक होती है। (बिहार, जिल्द 8, 472/ अल-हयात, जिल्द 2, पेज 385)

ان من دان الله بعباده يجتهد فيها نفسه بلا امام عادل من الله فأن سعيه غير مشكور وهو خال متحيّر
इमाम मुहम्मद बाक़िर (अस) ने इरशाद फ़रमाया :
बेशक जो शख़्स अपने नफ़्स को ज़हमत देते हुए अल्लाह तआला के मुक़ररर करे हुए इमामे आदिल के बग़ैर इबादत करे तो उसकी मसाई व कोशिश क़ाबिले क़ुबूल नहीं और वह परेशान व गुमराह है। (मुसतदरक, जिल्द 1, पेज 8/ अलहयात, जिल्द 2, पेज 396)

इमाम मूसा काज़िम (अस) ने फ़रमाया :
وطاعة ولاة العدل تمام العزّ
इताअते वालियाने अद्ल(आदिल क़ाएदीन) मुकम्मल इज़्ज़त (का बाएस) बनती है। (तोहफ़ुल उक़ूल, पेज 287 बाहवाला अलहयात, जिल्द 2, पेज 385)

मज़कूरा अहादीस के अलावा भी हज़ारों ऐसी रिवायात हैं जो कि हमारे दावे पर शाहिद हैं।
मज़कूरा अहादीस से चन्द उसूली निकात वाज़ेह होते हैं।
1: मुसलमानों के हाकिम या रहबर व क़ाएद का आदिल होना ज़रूरी है।
2: अदालत के अलावा उस के लिए मज़बूत दिल का मालिक और बहादुर होना भी शर्त है।
3: उसके लिए लाज़मी है कि वह इस्लामी अक़ाएद और मौजूदा ज़माने के तक़ाज़ों से आगाह हो।
4: जाबिर हाकिम की क़यादत में किसी क़िस्म का अमल दुरुस्त नहीं है।
जैसा कि इरशादे ख़ुदावन्दी है।

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّـهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنكُمْ
ऐ इमानदारों, ख़ुदा की इताअत करो और रसूल की और जो तुम में से साहिबाने अम्र हों उनकी इताअत करो।(निसा, 59)

ख़ुदा और रसूल की इताअत के फ़र्ज़ होने से कोई भी मुसलमान इख़्तिलाफ़ नहीं कर सकता और अल्लाह और रसूल का ख़ारजी(ज़ाहिरी) मिस्दाक़ भी मुअय्यन है। अगर से लफ़्ज़ “रसूल” (पैग़ाम लाने वाला) लुग़त के लिहाज़ से आम होने के साथ-साथ क़ुरआन और इस्लामी इस्तिलाह के मुताबिक़ एक शख़्स यानी रसूले अकरम के लिए ही नहीं बल्कि क़ुरआन की रू से उसका इतलाक़ साबिक़ा तमाम अम्बिया पर भी होता है। लेकिन मज़कूरा आयत में इस का मिस्दाक़, तमाम मुफ़स्सिरीन के नज़दीक रसूले इस्लाम हैं इस लिए इन दोनों अल्फाज़ “अल्लाह” और “रसूल” के मिस्दाक़ के तअय्युन के लिहाज़ से कोई इख़्तिलाफ़ नहीं है।

इसलिए यह मसला भी तमाम मुसलमानों के नज़दीक मुसल्लिमा हक़ीक़त है कि “उलुल अम्र” की इताअत वाजिब और फ़र्ज़ है हालाँकि मुसलमानों के दरमियान इस पर इख़्तिलाफ़ है कि
उलुल अम्र कौन है?
उलुल अम्र की इताअत के हुदूद क्या हैं?
उलुल अम्र की शरायत क्या हैं?
ख़ुद आयाए शरीफ़ा का बग़ौर मुतालेआ करने और क़ुरआन को तफ़सीर बिर राए को मुसल्लत ना करने की सूरत में मज़कूरा तीन सवालों का जवाब हासिल करने में मदद मिलती है मिस्दाक़ के लिहाज़ से आयाए शरीफ़ा का मफ़हूम वाज़ेह होता है।

इताअते ख़ुदा और रसूल की हुदूद और शरायत पहले ही मालूम हैं और रसूल की इस्मत पर भी तमाम मुसलमान मुत्तफ़िक़ हैं। इस के अलावा इताअते ख़ुदावन्दे करीम और इताअते रसूले ख़ुदा के फ़ौरन बाद उलुल अम्र की इताअत का ज़िक्र करने से यह नतीजा हासिल होता है कि
1) उलुल अम्र, सिफ़ाते रसूले अकरम का हामिल हो यानी मासूम हो।
2) ख़ुदा और रसूल की मुकम्मल इताअत करता हो और मुकम्मल तौर पर उन के नज़रियात व ख़ुतूत पर चलता हो।

जैसे कि उलुल अम्र के दो मिस्दाक़ हो सकते हैं
एक मिस्दाक़ सूरते इमकान में, और यह वह आला व अशरफ़ अफ़राद हैं जो इल्म, फ़ज़ीलत और इस्मत में रसूल जैसे हों, जैसा कि बहुत ज़्यादा रिवायत और अहादीस इस हक़ीक़त पर शाहिद हैं कि रसूले अकरम ने अपने मासूम जानशीनों का तअय्युन फ़रमाया था और वह हज़रत अमीरुल मोमिनीन से लेकर हज़रत साहिबे ज़मान तक हैं, चूँकि इस वक्त अहादीस और रिवायात का ज़िक्र करना ज़रूरी नहीं है, इसलिए हम आगे चलकर अहादीस बयान करेंगे।
मासूम उलुल अम्र के साथ-साथ उन अफ़राद व फ़ुक़हा का भी इस बारें में ज़िक्र करना ज़रूरी है जो कि ख़ुद मासूमीन की हयात के दौरान उन की तरफ़ से उन के नुमाइंदे थे। मसलन जैसा कि हज़रत अली ने अपने दौरे हुकूमत में मालिके अश्तर (रज) मुहम्मद(रज) इब्ने अबि बकर और उस्मान इब्ने हनीफ़(रज) को गवर्नर मुक़ररर फ़रमाया था, उन सब की इताअत बतौरे उलुल अम्र वाजिब थी। अलबत्ता उनको मुसतक़िल उलुल- अम्र की हैसियत हासिल नहीं थी लेकिन इमाम के नुमाइंदे और वकील की हैसियत से उनके हुक्म की तामील(अमल करना) ज़रूरी और लाज़िम थी। यह हक़ीक़त भी छुपी नही है कि मज़कूरा अफ़राद अगर से वकालत व नियाबत(प्रतिनिधित्व) की बाक़ी शरायत के हामिल थे लेकिन इस्मत की सिफ़त से बिला शक व शुबह महरूम थे फिर भी उनकी इताअत ज़रूरी व लाज़मी थी।
इसी तरह अहदे ग़ैबते कुबरा में जबकि इमामे मासूम हमारे सामने मौजूद नहीं हैं, उनके नुमाइंदा अफ़राद की इताअत के ज़रूरी होने में कोई शक नहीं है।
लेकिन यहां शर्ते इस्मत के ना होने की वजह से इताअत की शरायत और हुदूद का तअय्युन होना ज़रूरी है, आगे इसका ज़िक्र किया जाएगा। इसके अलावा फ़क़ीह जामे शरायत के बारे में फ़रामीने आइम्मा ए मासूमीन और इरशादाते रसूल को सामने रखा जाए, जैसा कि रसूले अकरम ने फ़क़ीह को خلفائی(मेरे जानशीन) और इमामे ज़माना ने “हुज्जती” (मेरी हुज्जत) से ताबीर फ़रमाया है।
इन फ़रामीन का लब्बे लुबाब यही है कि फ़क़ीह जामे शरायत साहिबे अम्र है। यानी ग़ैबत के ज़माने में फ़क़ीह जामे शरायत तमाम मुसलमानों के सियाह व सफ़ेद पर हाकिम है। जैसा कि रसूले अकरम और आइम्मा ए मासूमीन अपने अपने दौर में उस मनसब पर फ़ाएज़ थे।
इस बिना पर फ़क़ीह को उलुल अम्र मानना इमामे मासूम को उलुल अम्र मानने के मुख़ालिफ़ नहीं है और इस में कोई तज़ाद(फ़र्क़) भी नहीं पाया जाता, बल्कि यह विलायत उलुल-अम्र के हमेशा-हमेशा बाक़ी रहने का वाहिद ज़रिया है और विलायते इमाम और उनकी तय की हुई हुदूद में रह कर फ़राएज़ अन्जाम देना विलायत ए फ़क़ीह है।
लिहाज़ा अगर वली ए फ़क़ीह एक लम्हे के लिए भी विलायते-इमाम और उनकी तय की हुई हुदूद से ख़ारिज हो जाए या दूसरे लफ़्ज़ों में इताअते इमाम और इताअते रसूल से बग़ावत करे चाहे यह बग़ावत फ़िकरी हो या अमली, उस से उलुल अम्र की ख़ासियत फ़ौरन ख़त्म हो जाएगी और उसके पास किसी क़िस्म की विलायत या हुकूमत का हक़ नहीं रह जाएगा, इस तरह उलुल अम्र का मक़ाम भी फ़ौरन उस से छिन जाता है।
मज़कूरा बयान से यह बात वाज़ेह हो गई कि हर शख़्स “उलुल अम्र” के मनसब पर फ़ाएज़ नहीं हो सकता और ना हर कोई हाकिम या हर साहिबाने-हल-व-अक़्द, इस्लामी हाकिम और उलुल-अम्र बन सकते हैं। बल्कि मतलब इसके उलट है, जो शख़्स इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ हाकिम होगा वही सियाह व सफ़ेद पर हाकिम और उलुल-अम्र होने की सलाहियत रखता है।

खुलासा

मतलब यह कि उलुल अम्र के दो मिस्दाक़ है
1: मुसबत (पाज़िटिव)
2: मनफ़ी (निगेटिव)

मुसबत के भी दो मिस्दाक़ हैं
1: मासूम
2: ग़ैर मासूम, लेकिन मासूम के ख़ुतूत और नक़शे क़दम पर चलने वाले।
यानी वह कम से कम आदिल और रहबरी की सलाहियत के मालिक हों।

ग़ैर मासूम के भी दो मिस्दाक़ हैं।
1: ख़ुद आइम्मा के हुक्म के मुताबिक़ उनकी बाबरकत ज़िन्दगी में इस क़िस्म के बहुत अफ़राद मौजूद थे। जैसे कि हज़रत अली के तमाम गवर्नर और दूसरे आइम्मा के वकील।
2: ग़ैबते कुबरा के ज़माने में फ़क़ीह जामे शरायत इस मनसब “उलुल अम्र” का मिस्दाक़ है। यह बात पेशे नज़र रहे कि ग़ैरे मासूम उलुल अम्र वकालतन साबित है, यानी विलायते फ़क़ीह या विलायते “वाली” (गवर्नर) विलायते इमाम की ख़ादिम की हैसियत से है ना कि उसके मनाफ़ी(उलट) कोई चीज़ है।

उलुल अम्र के मनफ़ी(निगेटिव) मिस्दाक़ में वह सब हाकिम और साहिबाने इनतेज़ामिया(जो दूसरी तरह की इनतेज़ामी काम देखते हैं) शामिल हैं जिन में इस्लामी क़ानून(क़ुरआन व सुन्नत) की तय की हुई शरायत नहीं पायी जाती हैं।

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लेखक : हुज्जत उल इस्लाम मुहम्मद हसन सलाहुद्दीन

अनुवाद : आदिल अब्बास
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