क्या इत्तेहाद और तबररा एक साथ जमा हो सकते हैं?

क्या इत्तेहाद और तबररा एक साथ जमा हो सकते हैं?

सऊदिया के एक जलील उल क़द्र आलिम जनाब आयतुल्लाह शेख़ हुसैन अर राज़ी ने इस सवाल के जवाब में कि शिया किस तरह इत्तेहाद या तक़रीब और मसलकी रवादारी पर अमल पैरा हो सकते हैं जबकि शिया अक़ाएद के रू से तबररा फ़रुए दीन में शामिल है के जवाब में एक मरासिला तहरीर किया है जो हस्बे ज़ेल है।

वह लिखते हैं : कुछ लोग यह इशकाल करते हैं कि एक तरफ़ तो तबररा शियत में फ़रुए दीन में से है और दूसरी जानिब वह यह कहते हैं कि सब व लान ने करें यानी तबररा करना तर्क कर दें, जबकि रिवायत यह कहती है कि तवल्ला और तबररा एक साथ हैं।
हमारा जवाब यह है कि हमारा यह काम भी रिवायात की रौशनी मे है। वह रिवायात जिन में आया है कि उनके साथ हुसने मुआशरत रखें उनके बीमारों की अयादत करें और उनके जनाज़ों की तशी में शिरकत करें। इस तरह की रिवायात दसियों का तादाद में हैं। मैं मुबालिग़ा नहीं करना चाहता लेकिन अगर कोई तलाश करे तो सैंकड़ों रिवायात मिल जाए गी।
वह ख़त जो इमाम जाफ़र ए सादिक़ (अस) ने शियों के नाम लिखा है जो रौज़ा ए काफ़ी नाम की किताब के शुरू में आया है और शिया उस को अपनी मस्जिदों में रखते थे और नमाज़ के बाद उसको पढ़ते थे। इस ख़त में सब व लान ना करने के बारे में कुछ मसाएल थे और कुछ उन उमूर का इज़हार ना करने के बारे में कि जिनको फ़रीक़ मुख़ालिफ़ पसन्द नही करता।
दसियों रिवायतें हैं जिन में मज़म्मत की गई है और फ़रमाया है कि सिर्फ़ वही चीज़ें बयान करें कि जिन को वह पहचानते और समझते हैं और चीज़ें ना कहें कि जिन को वह ना पसन्द करते हैं और नहीं मानते और जो उनको बुरी लगती है। चूंकि इस काम से ख़ुदा का झुटलाया जाना लाज़िम आता है और रसूले ख़ुदा (सअ) और दूसरी चीज़ों की तकज़ीब लाज़िम आती है। हमने इन रिवायात को सहीह बुख़ारी से नक़्ल किया है और ना सहीह मुस्लिम से बल्कि यह रिवायात हमारी किताबों से नक़्ल हुई हैं, काफ़ी से और शेख़ सुदूक़ की किताबों से, अब हम कैसे इन रिवायात को छोड़ कर लान व सब के बारे में जो एक या दो रिवायतें हैं उनसे चिपक जाएं? यह थी पहली दलील।

दूसरी दलील यह है कि यह चीज़ बाएस नहीं बनती कि हम ग़लत कामों से बेज़ारी और बराअत का एतराफ़ ना करें। आमाल से बराअत करने और अशख़ास से बराअत करने में फ़र्क़ है। तबररा की अस्ली हालत आमाल से बराअत करना है। काम और रफ़्तार अगर दुरुस्त ना हो तो हम उस से ख़ुदा की पनाह मांगते हैं। तबररा की हालत दूसरे मज़ाहिब व मसालिक में भी मौजूद है। तवल्ला भी है और तबररा भी। किस ने कहा है कि हम इन कामों से बेज़ारी नही करते कि जिन्हें ख़ुदा व रसूल (सअ) और अहले बैत(अस) पसन्द नहीं करते। हम खुलकर इस बात पर फ़क़्र करते हैं कि हम अमीरुल मोमिनीन अली(अस) और उनके अहले बैत से ताल्लुक़ रखते हैं। और यह कि हम उनके दोस्तदार हैं और उनके दुश्मनों से नफ़रत करते हैं और यह बात खुलकर कहते हैं। और मुसलमानों में से कोई भी नहीं कह सकता कि मैं अली इब्ने अबी तालिब या अहले बैत(अस) से मुतानफ़फ़िर हूँ और उनको दुश्मन समझता हूँ, नासबियों को छोड़कर कि जो अहले बैत(अस) दुश्मनी रखते हैं और उसका ऐलान भी करते हैं कि कोई उनको नहीं मानता। फ़ज़ाएल अहले बैत में जो किताबें अहले सुन्नत ने लिखी हैं वह शियों से ज़्यादा हैं। मैंने चन्द महीने पहले इन किताबों के बारे में तफ़सील के साथ बात की थी कि जो उलेमा ए अहले सुन्नत ने हज़रत ज़हरा (सलाम उल्लाह) के बारे में लिखी हैं, कि उन में से ज़्यादा तर किताबें हज़रत के फ़ज़ाएल और उनकी मुहब्बत के बारे में लिखी गई हैं, और वह रिवायात जो चन्द जिल्दी किताबों में मौजूद हैं, उन सबका मैंने हिसाब किया तो पता चला कि 120 से ज़्यादा किताबें हज़रत के बारे में लिखी गई हैं, यह तो सिर्फ़ हज़रत ज़हरा सलाम उल्लाह अलैहा की मुहब्बत की तरफ़ दावत देते हैं और आप को पैग़म्बर (सअ) की अज़वाज और दीगर ख़्वातीन से बेहतर मानते हैं।
तिबीई बात है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बारे में अहले सुन्नत की किताबें हज़रत ज़हरा(अस) से ज़्यादा हैं। ऐसी हालत में आप कैसे कह सकते हैं कि मैं उनसे बेज़ार हूँ या कि तुम अहले बैत अलैहिस्सलाम के दुश्मन हो? जबकि वह इन फ़ज़ाएल को नक़्ल करते हैं और आप जानते हैं कि अहले बैत अलैहिस्सलाम क् फ़ज़ाएल की रिवायात जो हम नक़्ल करते हैं वह अहले सुन्नत की किताबों से ला गई हैं। पस कैसे हम उन की किताबों से नक़्ल करते हैं और उसके बाद कहते हैं कि आप आइम्मा अहले बैत (अस) के दुश्मन हो हमें आप से बेज़ारी का इज़हार करना चाहिए? यह दुरुस्त नहीं है अगर हमें कुछ अशख़ास के आमाल और उनकी रफ़्तार पर एतराज़ है तो हम अहले बैत अलैहिस्सलाम के दुश्मनों से ख़ुदा की पनाह मांगते हैं। जो लोग खुलकर दुश्मनी करते हैं हम उनसे खुलकर इज़हारे बेज़ारी करते हैं ना छुपकर, यहाँ तक कि अगर वह हमारे सामने हों और दुश्मनी का इज़हार करें तो हम कह सकते हैं कि हम तुम से बेज़ारी का इज़हार करते हैं क़ुरआन मुहब्बते अहले बैत अलैहिस्सलाम के वाजिब होने की ताकीद करता है
[قُلْ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَى (شوري/23)]
और जो इन को दोस्त नहीं रखता वह क़ुरआन का मुख़ालिफ़ है और जो क़ुरआन का मुख़ालिफ़ है हम उस से बेज़ारी का इज़हार कर सकते है। पस हमारा रवैय्या और मज़हब ज़ाहिर पर मबनी है और आशकार है। लेकिन मफ़ाहीम को मसादीक़ पर ततबीक़ देना, यह फ़रीक़ मुक़ाबिल के लिए क़ाबिले क़ुबूल नहीं है इसलिए कि जिस चीज़ को आप इन पर मुनतबिक़ करते हैं उसको वह नहीं करते।
नाम लेना और ततबीक़ करना ज़रूरयात में से नहीं है ; ख़ास कर तबररा का ताल्लुक़ तो एतक़ाद और दिल से है, यह बदनी और जवारिही जैसे ज़ुबान वग़ैरह का अमल नहीं है, तबररा क़लबी अमल है।
ऐसे ही हम शियों के कुछ आमाल से भी बेज़ारी और बराअत का इज़हार करते हैं और इस में कोई ममनूइयत और मुश्किल नहीं है। यह लोग जाहिल हैं जो इस तरह की हरकतें करते हैं। किताब काफ़ी में है कि अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम ग़ैर मुस्लिमों के साथ कैसा सुलूक करते थे। अहले बैत अलैहिस्सलाम अपने मुख़ालिफ़ीन के साथ कैसा बर्ताव करते थे इसके बारे में मैने बहुत कुछ लिखा है। वही सुलूक करते थे जो रसूले ख़ुदा (सअ) अपने मुख़ालिफ़ीन के साथ किया करते थे। मरहूम कुलैनी ने एक रिवायत काफ़ी में नक़्ल की है कि इमाम अली अलैहिस्सलाम कहीं जा रहे थे कि एक अहले किताब उनके हमराह हो गया, यह इस वक़्त की बात है कि जब हज़रत इराक़ में थे और वहां से कूफ़ा जाना चाहते थे, वह किताबी हीरा की तरफ़ जा रहा था वह उनके साथ हो गया आपस में बातें करते करते एक दोराहे पर पहुंचे। अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम उसे किताबी काफ़िर के साथ कि जो हीरा की तरफ़ जा रहा था उसके साथ जाने लगे। किताबी ने कहा ; क्या आप कूफ़ा नही जा रहे हैं? फ़रमाया : हाँ, उसने कहा ; कूफ़े का रास्ता उस तरफ़ है यह हीरा का रास्ता है। हज़रत ने फ़रमाया मैं जानता हूँ लेकिन मैं तुम्हारे साथ तुम्हें रुख़्सत करने के लिए थोड़ी दूर जाना चाहता हूँ। उसने कहा यह आदाब आपको किसने सिखाए हैं? हज़रत ने फ़रमाया : हमारे नबी (सअ) ने हमारी तरबियत की है। किताबी ने कहा अपना हाथ आगे बढ़ाएँ कि मैं ख़ुदा की वहदानियत और उसके रसूल की हक़कानियत की गवाही दूं।
चन्द क़दमों ने उस शख़्स को उसके बातिल एतक़ाद से हक़ की तरफ़ मोड़ दिया। लेकिन आप उनके बुज़ुर्गों पर लानत भेजते हो और उसके बाद कहते हो कि हमारे मज़हब और मसलक की तरफ़ आइए, तो कौन इसको मानेगा? असलन ऐसा शख़्स कोई दिवाना ही होगा कि उसकी और उसके बुज़ुर्गों की तौहीन की जाए और फिर भी वह कहे कि मैं तुम्हारा मज़हब इख्तियार करूंगा इसलिए कि आप ने मेरे बुज़ुर्गों की तौहीन की है! वह बुज़ुर्ग कि जिन पर वह ईमान और एतक़ाद रखता है जिस तरह आप आइम्मा अलैहिस्सलाम पर एतक़ाद रखते हो।

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