विलायत ए फ़क़ीह और इस पर बहस के दृष्टिकोण

विलायत ए फ़क़ीह

अब बहस का विषय यह है कि

जब ग्यारह आइम्मा (अ) इस दारे-फ़ानी से रेहलत(मौत) फ़रमा गये और इमाम ज़माना (अ) परदा ए ग़ैबत मे हैं तो मुसलमानों का सरपरस्त व हाकिम कौन होगा?

क्या फ़ुक़हाए एज़ाम इस मनसबे तशरीई पर फ़ाएज़ हैं या नहीं जिन पर आइम्मा फ़ाएज़ थे?

अगर हम फ़ुक़हा और उलेमा को आइम्मा ए मासूमीन (अ) का नाएब मानते हैं तो वह किस चीज़ में नाएब और ख़लीफ़ा हैं?

क्या उनकी नियाबत का दाएरा महदूद है या उतना ही है जितना आइम्मा (अ) और रसूले अकरम (स) के लिए था?

यह बहस विलायते फ़क़ीह के शीर्षक से मशहूर है।
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विभिन्न विचारधाराएं

और इस सिलसिले में उलेमा के दरमियान तीन क़ौल(कथन) पाए जाते हैं।
(1) फ़ुक़हा की विलायत का दाएरा सिर्फ़ क़ज़ावत(फ़ैसला करना) तक महदूद है और किसी क़ाज़ी(न्यायाधीश) के लिए जो विलायत साबित होती है, फ़ुक़हा की विलायत इसी सतह तक महदूद है।
(2) फ़ुक़हा से तमाम इख्तियारात सल्ब किए गए हैं सिवाए दो के एक फ़तवा देने और दूसरा क़ज़ावत का इख्तियार।
(3) फ़ुक़हा विलायते आम्मा के मालिक हैं।

इन तीनों नज़रियों की तफ़सील यह है :

(1) पहले नज़रिये की तफ़सील(विस्तार) :
फ़ुक़हा मुसलमानों की सिर्फ़ ज़ाती मुआमलात में दख़्ल दे सकते हैं, समाजी व इजतेमाई उमूर व मुआमलात में उन की दख़्ल अन्दाज़ी जाएज़ और दुरुस्त नहीं है। लिहाज़ा फ़क़ीह जब फ़तवा देता है तो वह सिर्फ़ बयाने अहकाम और अपनी इन्फ़िरादी हैसियत में यह काम अन्जाम देता है और इस हक़ीक़त से उस का कोई ताल्लुक़ नहीं होता कि कोई शख़्स उस पर अमल करता है या नहीं। यह बात तो बहुत वाज़ेह है।
इस नज़रिये के मुताबिक़ क़ज़ावत भी अलग क़रार पाई थी मगर तहक़ीक़ के बाद पता चलता है कि क़ज़ावत आज़ादी से और बिला शर्त साबित नहीं है। बल्कि फ़क़ीह को ऐसे दो लोगों या गिरोह(जो आपस में किसी बात के लिए तकरार कर रहे हों) के दरमियान फ़ैसला करने का हक़, दावा और लड़ाई को हल करने के इख़्तियारात का हासिल होना साबित है जो अपनी मर्ज़ी से उस के पास जाएं और उस से मसाएल दरयाफ़्त करें लिहाज़ा अगर वह ख़ुद पास ना जाएं तो इस नज़रिये के मुताबिक़ फ़क़ीह के लिए खुद से दख़्ल अन्दाज़ी करके फ़ैसला करने के किसी हक़ का हासिल होना साबित नहीं है।
इसी तरह एक इस्लामी मुआशरे मे बदउनवानियों के मुरतकिब अश्ख़ास और मुजरिमों के ख़िलाफ़ हुदूदे इलाही को जारी करने और उसको नाफ़िज़ करने के हक़ से महरूम है, जिस के नतीजे में फ़क़ीह पर कोई भी ज़िम्मेदारी आएद नहीं होती। इस नज़रिये की रू से इजतेमाई उमूर में एक आम आदमी और फ़क़ीह के लिए यकसां हुक्म है।
हुदूद व ताअज़ीरात के निफ़ाज़ के अलावा “उमूरे हिस्बिया” में भी फ़क़ीह को बाहैसियते फ़क़ीह दख़्ल अन्दाज़ी की इजाज़त नहीं बल्कि वह बाहैसियते मोमिन व मुसलमान दख़्ल अन्दाज़ी कर सकता है।
जैसा कि : अमवाले यतीम, अमवाले मजहूलुल मालिक

इसलिए अगर यतीमों के अमवाल या उन अमवाल में जिन के मालिक लापता हैं, दख़्ल अन्दाज़ी और तसररुफ़ का मसला दरपेश हो और मुजतहिद और उसका वकील मौजूद ना हो तो आम मोमिन व मुसलमान भी उसमे दख़्ल अन्दाज़ी कर सकता है लेकिन अगर फ़क़ीह व मुजतहिद तक रसाई मुमकिन हो तो उन्हें ज़्यादा हक़दार समझा जाएगा बल्कि इस सूरत में आम मोमिन के लिए दख़्ल अन्दाज़ी का हक़ ख़त्म समझा जाएगा। मुजतहिद को यह अव्वलियत व बरतरी “विलायते फ़क़ीह” के तहत हासिल नहीं बल्कि इसलिए हासिल है कि वह इस्लामी क़वानीन का माहिर और बाख़बर शख़्स है और दीगर मुसलमानों की निस्बत वह शरई मवाज़ीन व अहकाम पर बेहतर तरीक़े से अमल करने की अहलियत रखता है इसलिए “उमूरे हिसबिया” में फ़क़ीह की यह मुदाख़्लत (قدر متیقّن) की हैसियत रखती है, यानी अगर फ़क़ीह की जगह कोई आम मुसलमान यह काम सरअन्जाम देता तो ख़ता का ज़्यादा एहतमाल था बनिस्बत फ़क़ीह के।

बनाबरिन “उमूरे हिसबिया” में आम मोमिन पर मुजतहिद व फ़क़ीह की बरतरी अव्वलियत रखती है हाकमियत नहीं। इसलिए इस के अलावा दीगर शरई उमूर में फ़क़ीह जामे शरायत को हाकमियत का हक़ हासिल नहीं, जैसे कि रूइयते हलाल के सबूत के लिए फ़क़ीह फ़तवा तो दे सकता है लेकिन “फ़तवा हाकमियत” या हुक्म नहीं दे सकता। (तफ़सील के लिए मुलाहेज़ा हो “तनक़ीहुल उरवा” पेज 414 से 424, मुसतनद व किताब सौम। आक़ाए नराक़ी

ख़ुलासा
हुक़ूक़ दो क़िस्म के हैं
(1) हुक़ूक़ अल्लाह,
(2) हुक़ुक़ उन नास (इन्फ़िरादी वे इजतेमाई)

फ़क़ीह को सिर्फ़ और सिर्फ़ इन्फ़िरादी हुक़ूक़ में मुदाख़लत करने की इजाज़त है और वह हुक़ूक़ इजतेमाई व सियासी और हुक़ूक़ अल्लाह में मुदाख़लत करने का मजाज़(مجاز) नहीं है।

2: दूसरे नज़रिये की तफ़सील

इस नज़रिये के मुताबिक़ फ़क़ीह की विलायत व हाकमियत के दायरा ए इख़्तियारात को मज़ीद व वसी किया गया है। इसलिए अदलिया(क़ज़ावत) से मुतालिक़ उमूर में उसे फ़ैसला करने का हक़ हासिल है।
यानी हुकूमते आइम्मा (अ) के दौर में एक क़ाज़ी को जो इख़्तियारात हासिल थे वही इख़्तियारात ग़ैबते इमामे ज़माना (अ ) में फ़क़ीह को हासिल है। मसलन :
1: उमूरे हिसबिया में तसररुफ़ करना
2: क़ासिर, सफ़या और यतीम वगैरह के अमवाल की हिफ़ाज़त करना।
3: मज़कूरा अमवाल व अमलाक पर सरपरस्त का तक़ररुर करना।
4: रुइयते हलाल के सबूत का हुक्म देना।
5: हुदूद व ताज़ीरात का इजरा व निफ़ाज़।

लेकिन वह इजतेमाई उमूर जो क़ज़ावत से मुतालिक़ नहीं, वह फ़क़ीह के दायरा ए इख़्तियार से बाहर हैं। जैसा कि :
1: उम्मते मुस्लिमा के सियासी, इक़तेसादी और इजतेमाई रहबरी करना।
2: इस्लामी हुकूमत की तश्कील।
3: ज़रूरत पड़ने पर जिहाद का हुक्म देना।

ख़ुलासा : इस नज़रिये का ख़ुलासा यह हुआ कि फ़क़ीह के लिए दो चीज़ों का इख़्तियार साबित है।
1: फ़तवा देना।
2: क़ज़ावत बतौर मुतलक़ और तमाम वह तमाम वह उमूर जो क़ज़ावत से जुड़े हैं।

3: तीसरे नज़रिये की तफ़सील
यह नज़रिया मज़कूरा दोनों नज़रियात से बिल्कुल मुख़तलिफ़ है। यानी इसके तहत मज़कूरा दोनों नज़रियों से साबित शुदा इख़्तियारात के अलावा विलायते आम्मा भी फ़क़ीह के लिए साबित है। इसलिए मक़ामे फ़तवा और क़ज़ावत के साथ साथ विलायत और मरजइय्यते कुल मुस्लिमीन भी साबित है। इस मरजइय्यते कुल में सियासी, इक़तेसादी, इजतेमाई, और इनतेज़ामी उमूर भी शामिल हैं।

मुख़तसर यह कि फ़क़ीहे आदिल के लिए विलायते आम्मा और मुतलक़ ज़आमत यानी मुसलमानों की इन्फ़िरादी और इजतेमाई ज़िन्दगी से मुतालिक़ तमाम उमूर की निगरानी और हल्ल व फ़स्ल(मुतानाज़े उमूर में फ़ैसला करना) इसी तरह साबित है जिस तरह रसूले अकरम(स) और आइम्मा ए मासूमीन (अ) के लिए साबित थी।

मज़ीद तशरीह
मुमकिन है कुछ हज़रात को यह ग़लत-फ़हमी हो जाए कि तीसरे नज़रिये के हिसाब से रसूले अकरम(स) और आइम्मा ए अतहार (अ) की विलायत की तरह फ़क़ीह को भी विलायत हासिल है और इस तरह फ़क़ीह और आइम्मा(अ) के मक़ाम का बराबर होना लाज़िम है या जिस तरह आइम्मा को विलायते तकवीनी हासिल थी उसी तरह फ़क़ीह के लिए भी विलायते तकवीनी का साबित होना लाज़िम है।
लेकिन ऐसी कोई मसावात और बराबरी वुजूद नहीं रखती। इस फ़ासिद वहम व ख़याल का जवाब गुज़िश्ता बहस में मौजूद है लेकिन इसकी मज़ीद तशरीह और वहम व ख़याल को दूर करने के लिए कुछ तफ़सील बयान करना मुनासिब समझते हैं।

मज़ीद तशरीह के लिए तीन चीज़ों का एक दूसरे से अलग और जुदा होना ज़रूरी है।
1) विलायते तकवीनी
2) विलायते तशरीई
3) अल्लाह ताअला के नज़दीक मक़ाम वे मनज़िलते आइम्मा ए अतहार (अ)

हालाँकि कायनाती विलायत बुनियादी तौर पर सिर्फ़ अल्लाह से मख़सूस है लेकिन इसकी कुछ क़िस्में रसूले अकरम(स) और आइम्मा ए मासूमीन(अ) के लिए भी साबित हैं, “कायनाती” और “एतबारी” विलायत के दरमियान फ़र्क़ है और यह भी लाज़िम नहीं है कि जिस के लिए विलायते एतबारी साबित हो उसके लिए विलायते तकवीनी भी साबित हो। कुछ अलग तरह से कहा जाए तो विलायते तकवीनी उम्मते मुस्लिमा की रहबरी और इमामत के फ़राएज़ से मुकम्मल तौर पर अलग है।

कायनाती विलायत एक दूसरी हक़ीक़त है जिस की वजह से तमाम ज़रराते आलम, साहिबे विलायत के आगे सर तस्लीम ख़म कर देते हैं और कायनात का हर ज़ररा एटम से लेकर अन्जुम तक उसकी इताअत के लिए तैयार रहता है। हालांकि यह सब कुछ ख़ुदा के हुक्म से होता है।

यह मज़हबे हक़्क़ा इसना अशरी का मुसल्लिमा उसूल है कि इस मक़ामे विलायत पर कोई शख़्स फ़ाएज़ नहीं हो सकता, इस लिए इमामत और रहबरी ए मुस्लिमीन, विलायते एतबारी की एक सूरत है जो अल्लाह तआला ने (आगे बयान की जाने वाली नुसूस, आयात व रिवायात के मुताबिक़) फ़क़ीहे आदिल को अता की है और फ़क़ीह इस विलायते एतबारी के ज़रिए अपने फ़रीज़े को अदा कर सकता है।

फ़क़ीहे आदिल के फ़राएज़ में हुदूदे इलाही का इजरा, ज़ालिमों से मज़लूमों को उनके हुक़ूक़ वापस दिलाना, दुनिया भर के मज़लूमों की हिमायत करना, मालियात का जमा करना फिर उन्हें मसारिफ़े शरिया में ख़र्च करना और इस्लामी ममलिकत की हुदूद का दिफ़ा करना शामिल है, जिस तरह रसूले अकरम(स) के दौर में आप (स) पर और आइम्मा ए मासूमीन के दौर में उन पर यह फ़राएज़ आएद होते थे।

लिहाज़ा मज़कूरा उमूर की अहमियत के पेश नज़र मजरी(शरई अहकाम को नाफ़िज़ करने वाला) के कई होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, यानी यह अहकाम जब अपने ज़माने की ज़रूरत और अफ़ादियत के पेश नज़र जारी किये गये थे और आज के साइंसी, फ़िक्री और तहज़ीबी तौर पर तरक़्क़ी याफ़्ता ज़माने में जबकि यह फ़क़ीहे आदिल के ज़रिए से नाफ़िज़ किए जा रहे हैं, इनकी अफ़ादियत और ग़र्ज़ व ग़ायत में ज़माने के इस इख़्तिलाफ़ से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

यह नहीं कहा जा सकता कि मुआशरे की स्थिति के एतबार से मज़कूरा उमूर का इजरा दौरे रसूले अकरम(स) और अहदे आइम्मा ए ताहिरीन (अ) में मुनासिब बल्कि ज़रूरी तो था लेकिन फ़क़ीहे आदिल के इस मौजूदा दौर में मुआशरे की नुमाया तब्दीली के सबब अब उनके इजरा और निफ़ाज़ की ज़रूरत बाक़ी नहीं रही, क्योंकि हर आक़िल जानता है कि मौजूदा दौर में मज़कूरा उमूर का इजरा अहदे रसूले अकरम(स) से ज़्यादा ज़रूरी नहीं तो उस से कम भी नहीं है, इस बुनियाद पर फ़क़ीहे आदिल के लिए अहकामे ख़ुदावन्दी के इजरा के लिए सिर्फ़ एतबारी(विलायते तशरीई) साबित है।

इसी तरह विलायते एतबारी के सबूत से यह नतीजा कभी अख़्ज़ करना चाहिए कि फ़क़ीह को भी वही मक़ाम हासिल है जो मासूमीन(अ) को हासिल था, क्योंकि इस किताब(मज़मून) का विषय, हर लिहाज़ से मक़ाम व मनज़िलत और अज़मत के इसबात का नहीं बल्कि रहबर(फ़क़ीह) की इजतेमाई और इन्फ़िरादी ज़िम्मेदारियों और फ़राएज़ से मुतालिक़ है। इस विलायत के ज़रिए फ़क़ीह के कान्धों पर एक भारी बोझ डाला गया है ताकि वह मुसलमानों की हिदायत और रहबरी की ज़िम्मेदारी सँभाल ले।

विलायते एतबारी के इसबात का मतलब हरगिज़ यह नहीं है कि फ़क़ीह को क़ुर्ब व मनज़िलत के ऐसे मक़ाम पर पहुंचा दिया जाए जो एक आम इन्सान के मक़ाम से बढ़कर हो। उसे हरगिज़ यह मक़ाम हासिल नहीं हो सकता जैसा कि रिवायत के मुताबिक़ यह मक़ाम रसूले अकरम(स) और आइम्मा ए ताहिरीन(अ) के लिए मक़सूस है, यह मक़ाम ना उनसे पहले कभी कोई हासिल कर सका और ना उनके बाद कोई हासिल कर सकता है। जैसा कि रसूले अकरम(स) के मुतालिक़ जिबरईल(अ) ने फ़रमाया : “अगर एक ज़ररा भी आगे बढ़ा तो मैं जल जाउंगा”।

आइम्मा ए मासूमीन (अ) से मरवी है :
ان لنا مع اللہ حالات لا یسعھا ملک مقرب ولا نبی مرسل
” बेशक अल्लाह तआला के साथ हमारे कुछ मक़सूस हालात(रवाबित) हैं जिन का मतहम्मिल कोई मुक़र्रब फ़रिश्ता हो सकता है और ना कोई नबी ए मुरसल। ”

बहरहाल फ़क़ीह(जामे शरायत) के लिए वही विलायत(सरपरस्ती) साबित है जो आइम्मा ए ताहिरीन(अ) के लिए साबित थी। हालांकि इख़्तियारात की हुदूद के लिहाज़ से एक नुमायां फ़र्क़ है वह यह कि आइम्मा ए ताहिरीन(अ) की विलायते मुतलक़ा और मुकम्मल तरीन थी, उन की विलायत के दायरे से कोई फ़र्द अलग नहीं है लेकिन फ़क़ीह जामे शरायत के इख़्तियारात में यह ख़सुसियत नहीं है कि उनकी विलायत दीगर फ़ुक़हा पर लागू हो, यानी अगर एक दौर में एक से ज़्यादा फ़क़ीह जामे शरायत मौजूद हैं तो हर एक की अलग अलग विलायत और नियाबत इमामे ज़माना (अ) बतौर मुसतक़िल साबित है, लिहाज़ा एक दूसरे फ़क़ीह को उनके मनसब से माज़ूल या मनसूब करने का हक़ नहीं रखता, क्योंकि हर एक की सलाहियत और मरजाइय्यत की अहलियत दूसरे के बराबर है।
मज़कूरा तफ़सील की रौशनी में “विलायते फ़क़ीह” की हुदूद और उस के इख़्तियारात वही हैं जो रसूले अकरम(स) आइम्मा ए ताहिरीन के लिए साबित है।

विलायते फ़क़ीह की बहस के अलग ज़ाविये(दृष्टिकोण)
विलायते फ़क़ीह के बारे में एक सवाल यह है कि मसला ए विलायते फ़क़ीह कलामी और अक़ायदी मसला है या फ़िक़ही और फ़ुरुए दीन से जुड़ा है?

जवाब :
इस का जवाब मज़हबे अहले-बैत के मुताबिक़ बिल्कुल साफ़ है क्योंकि अस्रे ग़ैबत में “विलायते फ़क़ीह” मासूम इमामों की विलायत यानी नज़रिया ए इमामत का तसलसुल है जिस तरह मासूम इमामों(अ) की विलायत, रसूले अकरम(स) की विलायत का इमतेदाद व इसतेमरार और अहदाफ़े(मक़सद) अम्बिया के हुसूल का वाहिद ज़रिया है। लेकिन विलायते फ़क़ीह का दायरा इतना बड़ा है कि फ़िक़्ह के मुख़्तलिफ़ अबवाब में इसका तज़किरा ज़रूर आता है और कुछ फ़िक़ही मसाएल विलायते फ़क़ीह के बग़ैर क़ाबिल हल नहीं है। लिहाज़ा किताबे फ़िक़्ह में इस पर बहस की गई है अगर से इस बहस की जगह इल्मे कलाम ही क्यों ना हो। बहरहाल अपने पढ़ने वालों की आसानी और विलायते फ़क़ीह के मफ़हूम की मज़ीद वज़ाहत व तशरीह के लिए इस विषय से मुतालिक़ बहस व इस्तेदलाल के अलग अलग ज़ाविये और तरीक़ों का ज़िक्र करते हैं और हर ज़ाविये से इसको साबित किया जा सकता है।
1: अक़ाएदी व कलामी
2: फ़िक़ही
3: इजतेमाई

मज़कूरा तमाम ज़ावियों से अक़्ल व नक़्ल की रौशनी में विलायते फ़क़ीह पर बहस और इस्तेदलाल किया जा सकता है और क़ाबिले इस्बात भी है।

पहला ज़ाविया : अक़ाएद व कलाम

इल्मे कलाम में बेसते अम्बिया के ज़रूरी होने को साबित करने के लिए काफ़ी अक़्ली व नक़्ली दलीलें पायी जाती हैं और अल्लाह तआला की हिकमते बालिग़ा और लुत्फ़े इलाही के ऐन मुताबिक़ है कि इन्सान की तख़लीक़ के बाद उसकी हिदायत व रहबरी और उसकी सआदत व निजात के असबाब व ज़राए भी मुहैय्या करे इसलिए इन असबाब में अम्बिया की बेसत और वक़्त बा वक़्त आसमानी किताबों का नुज़ूल शामिल है इसलिए ख़त्मे नुबूवत के नज़रिये के बाद नज़रिया ए इमामत के मुताबिक़ अल्लाह तआला ने लोगों की हिदायत व रहबरी के लिए और इस्लामी निज़ाम चलाने के लिए हुकूमत की तशकील की ज़रूरत के फ़लसफ़े की रौशनी में इमामत का सिलसिला जारी किया ताकि मज़कूरा बाला “क़ायदा ए लुत्फ़ और क़ानून” हिकमते इलाही का मुकम्मल ज़ुहूर हो, नज़रिया ए विलायते फ़क़ीह पर वह तमाम अक़्ली व नक़्ली दलाएल क़ाबिले ततबीक़ हैं जो वुजूबे बेसते अम्बिया और रसूले इस्लाम के बाद वुजूबे नस्बे इमाम पर का़यम किये गये हैं।

वज़ाहत :
इस्लाम की तालीमात की रौशनी में 11 हिजरी में रसूले इस्लाम की रेहलत के साथ ख़त्मे नुबूवत भी हुआ और रिसालत की जगह क़यादत के तौर पर इमामत का सिलसिला जारी हुआ जो कि 265हिजरी से ग़ैबते सुग़रा का आग़ाज़ हुआ और इमामे ज़माना(अ) तक रसाई यानी उनकी बराहे रास्त हिदायत व क़यादत से इस्तिफ़ादा करने के मौक़े बहुत ही महदूद हो गए और यह हालत “ग़ैबते सुग़रा” तक़रीबन 330हिजरी तक जारी रही फिर ग़ैबते कुबरा शुरू हुआ और आज तक जारी है और अल्लाह तआला ही जानता है कि यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा। अब यह सवाल पैदा होता है कि अल्लाह तआला ने “जो अपने बन्दों पर मेहरबान और लुत्फ़ व हिकमत का सरचश्मा है” ग़ैबते कुबरा में लोगों की हिदायत व क़यादत के लिए क्या इन्तेज़ाम किया है। ग़र्ज़ यह है कि नज़रियाती और अक़ायदी हवाले से “क़ायदा ए लुत्फ़” और “निज़ामे हिकमत” हर ज़मान व मकान में बिला तफ़रीक़ जारी व सारी है और इन्सान बाहैसियते इन्सान दो चीज़ों का मोहताज रहा है और रहेगा।

1: क़ानून
2: का़एद
इसका लाज़मी नतीजा यह है कि इस्लामी मुआशरे की सरपरस्ती और आला क़यादत एक इस्लाम शनास और बासलाहत फ़र्द के हाथ के हाथ में होनी चाहिए अगर मासूम क़यादत मौजूद हो(रसूल या इमाम) तो यह क़यादत उसके पास होगी और अगर मासूम क़यादत मयस्सर ना हो तो सिफ़ात वे शरायत के हवाले से उस फ़र्द के ज़िम्मे होगी जो सबसे ज़्यादा मासूम क़यादत से नज़दीक हो(الاقرب فالاقرب) अल्लाह तआला क़ुरआन में हज़रत इब्राहिम(अ) के बारे में फ़रमाया :

إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِإِبْرَاهِيمَ لَلَّذِينَ اتَّبَعُوهُ وَهَـٰذَا النَّبِيُّ وَالَّذِينَ آمَنُوا ۗ وَاللَّـهُ وَلِيُّ الْمُؤْمِنِينَ
यक़ीनन इब्राहिम(अ) से सबसे ज़्यादा क़रीब उनके पैरो हैं और फिर यह पैग़म्बर और साहिबाने ईमान हैं और अल्लाह साहिबाने ईमान का सरपरस्त है। (अाले इमरान, आयत 68)

क़यादते मासूम से नज़दीक फ़ुक़हाए एज़ाम हैं जो इल्म, सलाहियत और अदालत में दूसरे तमाम अफ़रादे बशर से शाइस्ता हैं यह नज़रिया दरअस्ल इस बात को क़ुबूल करने का नतीजा है कि इस्लाम के मुताबिक़ तशकील हुकूमत का अस्ली फ़लसफ़ा इलाही इक़दार, इस्लामी निज़ाम और अद्ल व इन्साफ़ को मुआशरे में राएज व नाफ़िज़ करना है।

फ़िक़ही ज़ाविया :
फ़िक़ही ज़ाविये से हम किताब विलायते फ़क़ीह में अक़्ली, क़ुरआनी और रिवायत की रौशनी में बहस कर चुके हैं और वक़्त की वजह से मज़ीद दलीलें पेश करने से इजतेनाब करते हैं।

इजतेमाई ज़ाविया:
इन्सान तिबई तौर पर इजतेमाई पसन्द है और कोई भी इन्सान दूसरे अफ़राद से अलग थलग रहकर ज़िन्दगी के मुआमलात नहीं चला सकता बल्कि बनी नू्अ इन्सान के दूसरे अफ़राद से मिलजुल कर इन्फ़िरादी और इजतेमाई मुआमलात, मसाएल और ज़रूरयात हल कर सकता है और आपस में एक इजतेमाई तफ़ाहुम, तआव्वुन, एहतरामे मुताबादिल, दूसरे अफ़राद के हुक़ूक़ को मद्दे नज़र रखते हों। अपने हुक़ूक़ का हुसूल और उसका दिफ़ा वग़ैरह वग़ैरह। कुछ ऐसे मुशतरका उसूल हैं जिन के बग़ैर ना अमन क़ायम होगा ना ज़िन्दगी बसर करना मुमकिन मतालिबे बाला के हुसूल की दो बुनियादी शरायत दरकार हैं।
1: हुकूमत
2: निज़ाम व क़ानून
क्योंकि किसी भी मुल्क व मुआशरे का वुजूद या बक़ा हुकूमत के बग़ैर मुमकिन है इसलिए सिर्फ़ हुकूमत हो मगर क़ानून के बग़ैर हो तो वह जंगल में तब्दील हो जाएगा।

1: जरूरत ए हुकूमत
हर दौर में कोई ना कोई हुकूमत का होना ज़रूरी है ताकि अफ़रा तफ़री और हर्ज मर्ज पैदा ना हो और अमन आम्मा, जान व माल और नामूस महफ़ूज़ रह सकें इस्लाम और अक़्ल की निगाह में हुकूमत के क़याम की ज़रूरत पर कोई शुबह नहीं पाया जाता अब सवाल यह है कि ग़ैबते कुबरा में हुकूमत कौन चला सकता है? यानी मुसलमानों का हाकिम कौन होगा?

1: एक फ़र्ज़ यह है कि हुकूमते जाएरा और ज़ालिम की इताअत हो मगर यह फ़र्ज़ तालीमात क़ुरआन व सुन्नत मुतह्हिरा की सौ फ़ीसद ख़िलाफ़ वर्ज़ी है।
2: दूसरा एहतमाल, उदूले मोमिनीन के ज़रिये अगर आदिल मोमिनीन की हुकूमत क़ाबिले क़ुबूल है तो फ़क़ीहे आदिल जामे शरायत की हुकूमत “विलायत” बतरीक़ औला क़ाबिले क़ुबूल है। इसलिए कुछ फ़ुक़हा बाबे हिस्बा के हवाले से विलायते फ़क़ीह के क़ायल हैं।

2: निज़ाम :

दूसरी बुनियादी शर्त एक जामे व मुकम्मल निज़ामे हुकूमत है जिस के निफ़ाज़ से अद्ल व इन्साफ़ और हुक़ूक़े फ़र्दी व इजतेमाई का तहफ़्फ़ुज़ और पुर अमन ज़िन्दगी मयस्सर आ सकती है इस्लाम के नुक्ता ए निगाह से इस्लामी निज़ाम के अलावा कोई और निज़ाम मज़कूरा औसाफ़ से मुतसफ़ नहीं है अब सवाल यह है इस्लामी निज़ाम चलाने की अहलियत व क़ाबलियत कौन रखता है? ला मुहाला इस सलाहियत का मालिक सिर्फ़ और सिर्फ़ “फ़क़ीह जामे शरायत” ही हो सकता है इसलिए ज़माने हुज़ूरे मासूम(मसलन अमीरुल मोमिनीन(अ) के अहदे ख़िलाफ़त) में मरकज़ के अलावा बाक़ी शहरों में इमामे मासूम के नुमाइंदे हाकिम थे और इस्लामी निज़ाम नाफ़िज़ करते थे ज़माने ग़ैबत में भी यही निज़ामे नियाबत जारी हो सकता है।

विलायते फ़क़ीह के सबूत के लिए ऊपर लिखे तीन ज़ावियों के अलावा नीचे लिखे तरीक़ों से भी इस्तेदलाल किया जा सकता है।
1: इस्लामी निज़ाम की बक़ा व जावेदानी
2: बाबे हिस्बा
3: अद्ल व इन्साफ़ की नश्र व इशाअत की ज़रूरत। मगर हम कमी की वजह से ऊपर लिखी वुजूहात के ज़िक्र से गुरेज़ करते हैं।

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लेखक : हुज्जत उल इस्लाम मुहम्मद हसन सलाहुद्दीन
अनुवादक : आदिल अब्बास
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मुश्किल शब्दों के अर्थ :-

तशरीई : विधायी
दारे-फ़ानी : दुनिया
इख़्तियार : अपने इरादे से काम करने की आज़ादी
ताल्लुक़ : रिश्ता
मुतलक़न : आज़ादाना, बेक़ैद
बदउनवानी : भ्रष्टाचार
मुरतकिब : कसूरवार, किसी काम को करने वाला
यकसां : बराबर
ताअज़ीरात : सज़ाएं, दण्ड
अमवाल : सम्पत्ति
यतीम : जिसका कोई ना हो(मां बापय
मजहूलुल मालिक : जिसके मालिक का ना पता हो
तसररुफ़: अपनी तरफ़ से कुछ शामिल करना, या निकालना या बनाना
रसाई : पहुंच
मवाज़ीन : मानक
ख़ता : ग़लती
एहतमाल : शक
मुदाख़्लत: दख्ल अन्दाज़ी
तशरीह : व्याख्या
आएद : ज़िम्मे
मुसल्लिमा : अविवादित, जिस से इंकार ना हो
ग़र्ज़ : उद्देश्य
मरबूत : जुड़ा हुआ
वज़ाहत : समझाना, विवरण
बिला तफ़रीक़ : अन्तर के बिना
नुमायां : ज़ाहिर
इस्तेमरार : हमेशा जारी रहना
इमतेदाद : मुद्दत
इस्तेदलाल : दलील चाहना या लाना
ततबीक़ : मुताबिक़ करना
इजतेनाब : किनारा, परहेज़ करना,
अफ़ादियत : फ़ायदेमंद
मुतहम्मिल : बर्दाश्त करने वाला
इक़तेसादी : आर्थिक
तशकील : बनाना
तक़र्रुर : मुक़र्रर करना
क़ासिर : मजबूर
तसलसुल : सिलसिला
सल्ब : छीन लेना
महरूम : बाज़ रखा गया
दरपेश : सामना
नाएब : प्रतिनिधि
नियाबत : प्रतिनिधित्व
तहफ़्फ़ुज़ : हिफ़ाज़त, बचाव
मयस्सर : हासिल, वह चीज़ जो आसानी से मिल सके
मरकज़ : दरमियानी हिस्सा
तआव्वुन : एक दूसरे की मदद करना
नश्र व इशाअत : फैलाना, मशहूर करना,
सतह : स्तर
औसाफ़ : गुण
दिफ़ा : रक्षा
गुरेज़ : टालना, दूर रहना
मुशतरक : साझे का, दो या दो से ज़्यादा लोगों में एक चीज़ का पाया जाना
अख़्ज़ करना : निष्कर्ष तक पहुंचना

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