विलायत की क़िस्में

अक़साम विलायत

विलायत की दो क़िस्में हैं-
१- विलायत ए तकवीनी(कायनाती विलायत)
२- विलायत ए तशरीई(क़ानूनी विलायत)

१- विलायत ए तकवीनी(कायनाती विलायत)

विलायत ए तकवीनी और उस की तमाम क़िस्में ख़ुद ज़ाते ख़ुदावन्दी से मक़सूस हैं। अलबत्ता विलायत ए तकवीनी की बाज़ क़िस्मों में मासूमीन को हक़्क़े विलायत हासिल है, जिन का ज़िक्र किया जायेगा। विलायत ए तकवीनी की कुछ क़िस्में हैं, जिन का मुख्तसर ज़िक्र करना मुनासिब होगा।

१- विलायत ए ख़ल्क़(तख़लीक़ी विलायत)
२- विलायत ए तदबीर(विलायत ए अम्र)

१- विलायत ए ख़ल्क़(तख़लीक़ी विलायत)

विलायत ए ख़ल्क़ का मतलब यह है कि तमाम कायनात की एजाद(सृजन) ज़ात ए इलाही से जुड़ी है और अल्लाह के अलावा कोई और ख़ालिक़ नही है।
इरशाद होता है –

أَلَا لَهُ الْخَلْقُ وَالْأَمْرُ ۗ تَبَارَكَ اللَّـهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ
आगाह हो कि बनाना और हुक्म देना उसी का काम है अल्लाह कुल आलमीन का परवरिश करने वाला, साहिबे बरकत है। (सूरए आराफ़ ५४)

قُلِ اللَّـهُ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ
तुम यह कह दो कि अल्लाह हर चीज़ का पैदा करने वाला है और वह यकता ज़बरदस्त है। (सूरए राद १६)

هَلْ مِنْ خَالِقٍ غَيْرُ اللَّـهِ يَرْزُقُكُم مِّنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ ۚ
क्या अल्लाह के सिवा कोई दूसरा पैदा करने वाला भी है जो आसमान व ज़मीन से तुमको रोज़ी दे रहा है। (फ़ातिर ३)

قَالَتْ رُسُلُهُمْ أَفِي اللَّـهِ شَكٌّ فَاطِرِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ
क्या आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले ख़ुदा के बारे में तुमको शक है? (इब्राहीम १०)

मज़कूरा आयात में बयान किया गया है कि हर चीज़ की ख़ालिक़ ख़ुद ज़ाते इलाही है और उस ज़ात के अलावा कोई भी ख़ालिक़ बनने की अहलियत नहीं रखता। इस बात को समझने के लिए क़ुरआन करीम ने एक और तरीक़ा व अन्दाज़ इख्तियार किया है और वह है नातवानी और आजिज़ी का एहसास दिलाना। यानी अगर वाकई कोई क़ाबिले परस्तिश और शरीके ख़ालिक़ है तो कम से कम एक चीज़ एजाद और ख़ल्क़ करके अपनी ख़ल्लाक़ियत का सबूत दे।

أَرُونِي مَاذَا خَلَقُوا مِنَ الْأَرْضِ أَمْ لَهُمْ شِرْكٌ فِي السَّمَاوَاتِ
ज़रा मुझे तो दिखाओ क्या ज़मीन की कोई चीज़ उन्होंने पैदा की है या आसमानों में उन का कोई साझा है? (सूरए फ़ातिर ४०)

أَيُشْرِكُونَ مَا لَا يَخْلُقُ شَيْئًا وَهُمْ يُخْلَقُونَ
क्या उनको शरीक ठहराते हो जो कोई चीज़ पैदा नहीं करते और वह खुद ही पैदा किए जाते हैं। (सूरए आराफ़ १९१)

इन के अलावा भी बहुत सी क़रआनी आयात से ये मालूम होता है कि हर चीज़ का ख़ालिक़े हक़ीक़ी ख़ुदावन्दे आलम है और कोई फ़र्द ख़िलक़ते कायनात में शरीक नहीं।

मुख्तसर ये कि आगे लिखे उमूर से मफ़हूमे ख़ालिक़ का खुलासा बयान किया जा सकता है।
१- कायनात के तमाम मवाद को ख़ुदावन्दे आलम ने खुद पैदा किया है।
२- जमादात की बनावट व शक्ल और तमाम सूरतों की ख़ालिक़ ख़ुद ज़ाते इलाही है।
३- ज़ी-रूह(रूह वाले) मक़लूख़ात के जिस्म व रूह की ख़ालिक़ ख़ुद ज़ाते इलाही है।
यह बात क़ाबिले तवज्जो है कि किसी चीज़ की शक्ल या सूरत की एजाद के लिए किसी मुसतक़िल हुक्म या ख़ालिक़ की ज़रूरत नहीं है बल्कि सूरत माद्दे की ताबे है जहाँ माद्दा मौजूद होता है वहाँ सूरत भी लाज़िमी मौजूद होती है लिहाज़ा ख़ुदा पर शक्ल व सूरत के ख़ालिक़ का इतलाक़(लागू) माद्दे की तख़लीक़ और एजाद के एतबार से होता है।

मज़कूरा बयान से यह हक़ीक़त भी वाज़ेह हो जाती है कि क़ुरआन करीम में ग़ैर ख़ुदा के लिए शब्द “ख़ालिक़” के इस्तेमाल से क्या मुराद है। क्या वह असलियत में अल्लाह का शरीक व मददगार है? या वह ख़ुद ख़ालिक़, मुसतक़िल और जुदागाना हैसियत का मालिक है? या शब्द ख़ालिक़ के इतलाक़ से मुराद कुछ और है?
इसलिए हज़रत ईसा (अस) के बारे में इरशाद ख़ुदावन्दी है :

أَنِّي أَخْلُقُ لَكُم مِّنَ الطِّينِ كَهَيْئَةِ الطَّيْرِ فَأَنفُخُ فِيهِ فَيَكُونُ طَيْرًا بِإِذْنِ اللَّـهِ ۖ
बेशक मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से परिन्दे की सूरत पैदा कर दूँगा फिर उस में फूंक मारूंगा फिर वह हुक्मे ख़ुदा से परिन्दा बन जायेगा। (सूरह अाले इमरान, आयत 49)

وَإِذْ تَخْلُقُ مِنَ الطِّينِ كَهَيْئَةِ الطَّيْرِ بِإِذْنِي فَتَنفُخُ فِيهَا فَتَكُونُ طَيْرًا بِإِذْنِي ۖ وَتُبْرِئُ الْأَكْمَهَ وَالْأَبْرَصَ بِإِذْنِي ۖ وَإِذْ تُخْرِجُ الْمَوْتَىٰ بِإِذْنِي
(ऐ ईसा उस वक़्त को याद करो) कि जिस वक़्त तुम मेरे हुक्म से गुन्धी हुई मिट्टी में से परिन्दे की शक्ल व सूरत बनाते थे फिर इस में फूंक मारते थे तो वह मेरे हुक्म से परिन्दा बन जाता था और तुम मादरज़ाद अन्धे और कोढ़ी को मेरे हुक्म से अच्छा कर देते थे और यह कि तुम मेरे हुक्म से ज़िन्दा करते थे। ” (सूरह माएदा)

मज़कूरा आयात ख़ुद इस बात की रौशन गवाह हैं कि हज़रत ईसा (अस) बतौर मौजिज़ा यह काम अन्जाम देते थे जिन का ज़िक्र आयात में हुआ है ख़ुद कभी ख़ालिक़ होने का दावा नहीं किया है और ना उन्होंने ख़ालिक़ का काम (मुस्तक़िलन) अन्जाम दिया है उनका काम सिर्फ मवाद जमा करके उसे शक्ल व सूरत में ढालना था और यह काम हर इन्सान अन्जाम दे सकता है मगर उस काम के मौजिज़ा होने की वजह वह “रूह” है जो इस शक्ल में दाख़िल होकर एक हक़ीक़ी परिन्दा बन जाती है। यह काम ख़ुदा के हुक्म से हज़रत ईसा (अस) ज़रिये अन्जाम पाता है। इसी बिना पर हज़रत ईसा (अस) सिर्फ़ मज़हर हैं, परिन्दे के हक़ीक़ी ख़ालिक़ नहीं।

इस लिए मुर्दा को ज़िन्दा करना और जुज़ाम व बरस के के मरीज़ों को शिफ़ा देना दर हक़ीक़त ख़ुदा वन्दे आलम का काम है। लेकिन यह काम हर शख़्स के ज़रिये अन्जाम नहीं पा सकता बल्कि इसका ज़रिया ख़ुदा के मक़सूस बन्दे ही बनते हैं और इसी का नाम मौजिज़ा है। इस क़िस्म के अफ़आल(क्रियाएं) व आमाल से इस राज़ व इसरार का सुराग़ मिलता है जो ख़ालिक़ और उस की मक़सूस मख़लूक़ के दरमियान रिसालत व नुबूवत की शक्ल में क़ायम है। आयात क़ुरआनी के अलावा नुसूसे आइम्मा अहले-बैत (अस) इस हक़ीक़त पर गवाह हैं कि ख़ुदा वन्दे आलम के अलावा कोई ख़ालिक़ है और ना राज़िक़। दुआए जौशन कबीर के कुछ जुम्ले यहां नक़्ल करते हुए हम इस बहस को ख़त्म करते हैं जो कि ख़ालक़ियत को सिर्फ़ अल्लाह तआला में मुनहसिर रखने के बारे में की गई है।

ऐ वह हस्ती कि मक़लूक़ात को जिस के सिवा कोई पैदा नहीं करता। (हिस्सा 91)
ऐ वह हस्ती कि जो हर चीज़ को पैदा करने वाली है। (हिस्सा 18)
ऐ वह ज़ात कि जिस के सिवा कोई मुर्दा को ज़िन्दा नहीं करता। (हिस्सा 91)

विलायत तदबीरी (विलायत ए अम्र)

विलायते तकवीनी की दूसरी क़िस्म विलायते तदबीरी है, यानी हर चीज़ को ख़ल्क़ करने के बाद उस के वुजूद की बक़ा, नशो व नुमा और इरतेक़ा वग़ैरह के क़वानीन बनाने वाला सिर्फ़ ख़ुदा वन्दे आलम है हालांकि इस मक़सद के हुसूल के लिए अल्लाह तआला ने तमाम मख़लूक़ात को एक ऐसा निज़ामे हयात दिया है जिस के तहत हर चीज़ अपने कमाल तक पहुंच सकती है और आलम को आलमे इलल व मालूल क़रार देने की वजह से हर चीज़ की इल्लत और उसके लिए ज़रूरी निज़ाम का सरचश्मा ख़ुद ज़ाते बारी है और हर चीज़ का का़नून तबिअत और दस्तूरे हयात इसी ज़ात के इख़्तियार और इरादे के तहत बनाया गया है।

أَلَا لَهُ الْخَلْقُ وَالْأَمْرُ ۗ تَبَارَكَ اللَّـهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ
देखो हुकूमत और पैदा करना बस ख़ास इसी के लिए है। (सूरह अल-आअराफ़, आयत 54)

فَقَضَاهُنَّ سَبْعَ سَمَاوَاتٍ فِي يَوْمَيْنِ وَأَوْحَىٰ فِي كُلِّ سَمَاءٍ أَمْرَهَا
हर आसमान में वही के ज़रिये से उसके मुनासिब हाल हुक्म पहुंचा दिया। (सूरह फ़ुस्सेलात, आयत 12)

يُدَبِّرُ الْأَمْرَ مِنَ السَّمَاءِ إِلَى الْأَرْضِ
आसमान से ज़मीन तक के मामले की तदबीर वही(अल्लाह) करता है। (सूरह सजदा, आयत 5)

“नोट: विलायत ए तकवीनी एक बड़ा और मुश्किल विषय है जिसको हमने यहां उतना ही लिखा है जितना लिखने व बताने पर लेखक ने सही समझा, कम शब्दों में यह अच्छी वज़ाहत(व्याख्या) है। लेकिन हम समझते हैं कुछ तालिबे-इल्म और जानना चाहते होंगे, उनके लिए हमने एक छोटी किताब बनाई है विलायत ए तकवीनी के नाम से, जिसको जल्द ही आपके सामने पेश किया जाएगा। (अनुवादक) ”

२: विलायत ए तशरीई (क़ानूनी विलायत) :

अल्लाह तआला ने इन्सान वग़ैरह(अक़्ल वाले) को ख़ुद मुख़्तार बना कर ख़ल्क़ किया और बेशक ख़ुद मुख़्तार के दरमियान तसादुम, निज़ा, एक दुसरे के हुक़ूक़ नज़र अन्दाज़ करने और सिर्फ़ ज़ाती मफ़ाद को मुक़द्दम रखने की ख़्वाहिश होती है। इसलिए इस इन्सान में शैतानी ताक़तों, हैवानी इम्तियाज़, शहवत-परस्ती और शोहरत तलबी का रुझान मौजूद होने की वजह से उसकी ज़िन्दगी को माअमूल पर लाने, उसके लिए हर एक फ़ितरी आज़ादी से फ़ायदा उठाने, उसके अपने पैदाइशी हुक़ूक़ की निगहदारी और एक दूसरे के हुक़ूक़ की वज़ाहत करने का इन्तज़ाम ख़ुद ख़ुदा वन्दे-आलम को करना है। लिहाज़ा बनी-नूअ इन्सान की इजतेमाई और इन्फ़िरादी ज़िंदगी के लिए क़ानून व दस्तूरसाज़ी का हक़ सिर्फ़ उसी ज़ात को पहुंचता है जो इस मख़लूक़ की तमाम दाख़िली, ज़ाहिरी व बातिनी ख़्वाहिशात से आगाह हो।

बहरहाल यह एक तवील बहस है कि “हक़्क़े तशरीअ” यानी क़ानून साज़ी का हक़ सिर्फ़ ख़ुदा के लिए मक़सूस है? या ख़ुद इन्सान अपनी अक़्ल व होश और ज़कावत से आननफ़ानन वक़्त के तक़ाज़ो के मुताबिक़ अपनी इन्फ़िरादी और इजतेमाई ज़िन्दगी के लिए क़ानून बना सकता है?
अगर से यह बात बहस तलब है मगर इस बहस का नतीजा इस्लामी नुक़्ता ए निगाह से बिल्कुल वाज़ेह है कि तौहीदे इलाही को मानने के बाद यह बहस बिल्कुल बेजा साबित होती है।
बहरहाल क़ानून साज़ी की बुनियादी शर्त इल्म व आगाही है और इस सिफ़त से ख़ुदा के अलावा हर फ़र्द महरूम है। इसलिए अगर किसी के पास थोड़ा सा महदूद इल्म हो तो भी यह उसकी अपनी ज़ाती ज़िन्दगी के लिए काफ़ी नहीं है चेजायके इजतेमाई ज़िन्दगी के लिए काफ़ी हो। नीज़ क़ुरआन की मनतिक़ के मुताबिक़ हुक्मे ख़ुदा के ख़िलाफ़ कोई भी हुक्म हो वह गुमराही और उस का हाकिम गुमराह-कुन और ताग़ूत है। इसलिए इरशाद होता है :

وَمَن يَبْتَغِ غَيْرَ الْإِسْلَامِ دِينًا فَلَن يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الْآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ
और जो इस्लाम के अलावा किसी दीन का ख़्वास्तगार होगा वह उस से हरगिज़ क़ुबूल नहीं किया जाएगा और वह रोज़ क़यामत नुक़सान उठाने वालों में से होगा। (सूरह आले इमरान, आयत 85)

وَمَن لَّمْ يَحْكُم بِمَا أَنزَلَ اللَّـهُ فَأُولَـٰئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ
और जो अल्लाह के नाज़िल किए हुए(फ़रमान) के मुताबिक़ हुक्म ना करे तो ऐसे लोग काफ़िर हैं।
(सूरह माएदा, आयत 44)

وَمَن لَّمْ يَحْكُم بِمَا أَنزَلَ اللَّـهُ فَأُولَـٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
और जो लोग इसके मुताबिक़ हुक्म ना करें जो कुछ अल्लाह ने नाज़िल किया है पस वही लोग ज़ालिम हैं। (सूरह माएदा, आयत 45)

ۚوَمَن لَّمْ يَحْكُم بِمَا أَنزَلَ اللَّـهُ فَأُولَـٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ
और जो अल्लाह के नाज़िल किये हुए (फ़रमान) के अनुसार फ़ैसला ना करे वही लोग फ़ासिक़ हैं। (सूरह माएदा, आयत 47)

إِنِ الْحُكْمُ إِلَّا لِلَّـهِ ۖ يَقُصُّ الْحَقَّ ۖ وَهُوَ خَيْرُ الْفَاصِلِينَ
इख्तियार व हुक्म सिर्फ़ अल्लाह ही को है वह हक़ को बयान करता है और वही सब से बेहतर फ़ैसला करने वाला है। (सूरह अनआम, आयत 57)

أَفَغَيْرَ دِينِ اللَّـهِ يَبْغُونَ وَلَهُ أَسْلَمَ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ طَوْعًا وَكَرْهًا وَإِلَيْهِ يُرْجَعُونَ
दीन ख़ुदा के सिवा किसी और दीन के ख़्वास्तगार हैं? हालांकि जो आसमानों और ज़मीन में है ख्वाह मख़वाह उसके मुती हैं और उसी के हुज़ूर पलट कर जाएंगे। (सूरह आले इमरान, आयत 83)

इस बिना पर विलायत की दो क़िस्में “तकवीनी” और “तशरीई” हक़ीक़त में ज़ाते इलाही से मक़सूस हैं। लेकिन अल्लाह ताअला ने अपने कुछ मक़सूस बन्दों को विलायते तकवीनी से नवाज़ा है। इस बारे में अगर से काफ़ी बहस व तमहीस और जिदाल व निज़ा हुअा है फिर भी एक चीज़ पर तमाम इस्लामी फ़िरक़े मुत्तफ़िक़ हैं कि मौजिज़ाते अम्बिया और उनके हाथों पर ज़ाहिर होने वाली करामात, एक नूअ तसररुफ़ और कायनाती विलायत की रौशन दलील हैं। यह भी एक हक़ीक़त है कि अम्बिया ए एज़ाम (अस), सय्यद उल मुरसलीन (स) और आइम्मा ए ताहिरीन (अस) की विलायते तकवीनी तमाम उलेमा ए शिया और रिवायते अहले-बैत(अस) के मुताबिक़ साबित है अगर से इसकी तफ़सील व तशरीह में इख़्तिलाफ़ है।

चूँकि यह बहस इस वक़्त मौज़ू से ख़ारिज है इसलिए इस पर फ़िलहाल कोई दलील पेश करने की जगह हम इसे यहीं ख़त्म करते हैं।

तमाम अम्बिया के लिए विलायते तशरीई का सुबूत एक मुसल्लिमा हक़ीक़त है। यानी अल्लाह ताअला ने तमाम अम्बिया व मुरसलीन (अस) को एक नूअ विलायत और इख़्तियार देकर भेझा है जिस का नाम विलायते तशरीई और हुकूमत व रिसालते एतबारी है।

मज़कूरा लफ़्ज़ “विलायते तशरीई” से कोई शख़्स इस ग़लत फ़हमी का शिकार ना हो जाए कि अल्लाह ताअला ने क़ानून व आइन साज़ी का इख़्तियार अम्बिया को दे दिया है यानी हक़ीक़त में क़ानून साज़ी का हक़ अल्लाह को हासिल था लेकिन अम्बिया की को भेजने के बाद ख़ुदा ने यह हक़ अम्बिया के हवाले कर दिया यह एक लफ़्ज़ी ग़लत-फ़हमी है जो लफ़्ज़े “तशरीअ” से होती है। हक़ीक़त में इस से मुराद यह है कि क़ानून साज़ी का हक़ सिर्फ़ अल्लाह को हासिल है और अल्लाह इस हक़ से कभी भी दस्तबरदार नहीं हुआ और ना कभी हो सकता है और ना ही किसी के हवाले किया है बल्कि अम्बिया (अस) हुक्मे ख़ुदा को लोगों तक पहुंचाने और उसे लोगों पर नाफ़िज़ करने का पूरा हक़ रखते हैं जबकि ख़ुद किसी क़ानून को बनाने का हक़ नहीं रखते।

إِنِ الْحُكْمُ إِلَّا لِلَّـهِ
हुकूमत(हुक्म करने का हक़) तो सिर्फ़ ख़ुदा ही के लिए है। (सूरह अनआम, आयत 57)

وَلَوْ تَقَوَّلَ عَلَيْنَا بَعْضَ الْأَقَاوِيلِ ﴿٤٤﴾ لَأَخَذْنَا مِنْهُ بِالْيَمِينِ ﴿٤٥﴾
अगर रसूल हमारी निस्बत कोई झूठ बात बना ले तो हम उसका दाहिना हाथ पकड़ लेते। (सूरह हक़, आयत 44,45)

इस बिना पर रसूले ख़ुदा अहकाम के मुबैय्यन व मुफ़स्सिर और शरियत के नाफ़िज़ करने वाले हैं, इसलिए विलायते तशरीई का मफ़हूम यह हुआ कि अम्बिया और मुरसलीन को इन्सान की इन्फ़िरादी व इजतेमाई ज़िन्दगी के मुआमलात, उमूरे ममलिकत व सियासत, अख़लाक़ तहज़ीब व तमद्दुन मुख़तसर यह कि हर ज़िन्दगी के हिस्से मे दख़्ल अन्दाज़ी का हक़ हासिल है जो अल्लाह ताअला ने उन्हें अता फ़रमाया है जबकि बाक़ी इन्सानों को यह हक़ हासिल नहीं।

النَّبِيُّ أَوْلَىٰ بِالْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنفُسِهِمْ ۖ
नबी (स) तो मोमिनीन से ख़ुद उन की जानों से भी बढ़ कर हक़ रखते हैं। (सूरह अहज़ाब, आयत 6)

जब रसूल (स) अपनी सवाबदीद के मुताबिक़ और हुक्मे इलाही के तहत कोई फ़ैसला फ़रमाता है तो किसी को इस पर एतराज़ करने की इजाज़त नहीं है।

وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى اللَّـهُ وَرَسُولُهُ أَمْرًا أَن يَكُونَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ مِنْ أَمْرِهِمْ ۗ وَمَن يَعْصِ اللَّـهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا مُّبِينًا
और ना किसी ईमानदार मर्द को यह मुनासिब है और ना किसी ईमानदार औरत को कि जब ख़ुदा और उसका रसूल किसी काम का हुक्म दें तो उन्हें अपने इस काम (के करने ना करने) का इख़्तियार हो। (सूरह अहज़ाब, आयत 36)

रसूले अकरम (स) की रेहलत के बाद मज़कूरा “विलायत तशरीई” (हक़्क़े एतबारी) ख़ुदा के हुक्म से आप के जानशीनों और ख़ुलेफ़ा-ए-मासूमीन (अस) में मुनतक़िल हो गई। उलेमा ए शिया में से किसी को इस बात से इख़्तिलाफ़ नहीं है कि बारह इमाम (अस) रसूले अकरम (स) के जानशीन हैं सिवाए उन चीज़ों के जो सिर्फ़ रसूले अकरम(स) से मक़सूस हैं। यानी नुबूवत व रिसालत और कुछ अहकाम।

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लेखक : हुज्जत उल इस्लाम मुहम्मद हसन सलाहुद्दीन
अनुवादक : आदिल अब्बास
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