|| विलायत ए फ़क़ीह अक़्ल की रौशनी में ||

wilayat e faqih

विलायते-ए-फक़ीह के सबूत के लिए वही अक़्ली दलील क़ायम हेै, जो हूजूरे अक़रम स.अ.व. के बाद ज़रूरते इमाम के मौज़ू पर क़ायम की गयी थी, इस दौर में भी वही जरूरत बाक़ी है, जो रसूले अकरम की रेहलत के बाद मौजूद थी।
इस अक़्ली दलील का खुलासा यह है कि रसूले अकरम का जानशीन एैसा शख्स हो सकता है, जो तमाम सिफ़ात में उनका हम पल्ला हो, ऐसा मुम्कीन ना होने की सूरत में ऐसा फ़र्द इस्लामी हुकूमत का सरबराह और इस्लामी अहकाम का मुफ़स्सिर व मुबैय्यन बनने का अहल है। जो बाक़ी मुस्लमानों से इल्म, शुजाअत और दीगर सिफ़ाअत में अफ़ज़ल हो ताकि इस्लामी क़ानून के निफ़ाज में इल्मी और अम्ली दुश्वारी पेश न आए। इस दलील का मज़ीद बयान करना फ़िलहाल मौज़ू से ख़ारिज है इसलिए इसकी मज़ीद तशरीह के तालेबीन मुफ़स्सल किताब की तरफ़ रूजू फ़रमायें।
इसी तरह फ़क़ीह जाम-ए-शरायत दौर-ए-गै़बते कुबरा इमामे-ज़मान में वाहिद ऐसी शख्सियत है, जो बाक़ी तमाम मुसलमानों की निस्बत इमामे-ए-ज़माना (अ.स) और आइम्मा-ए-मासूमीन (अ.स.) से ज्यादा क़रीब है। क्योंकि फ़क़ीह में जो इल्मे शरीयत पाया जाता हेै। वह बाक़ी मुस्लमानों में आम तौर पर नही पाया जाता लिहाज़ा उनमें अदालत और क़यादत की सलाहियत का बदरज-ए-अत्म मौजूद होना भी जरूरी है।

दौरे-ए-हाज़िर में निफ़ाज़े इस्लाम:
इस जगह पर एक बुनियादी सवाल सामने आता है। कि क्या मौजूदा दौर में पहले के अदवार की तरह इस्लाम का निफ़ाज़ ज़रूरी है या नही? जवाब नहीं में होने की सूरत में इसकी वजह नीचे दिये वुजूहात में से एक हो सकती है।

1. इस्लाम की मन्सूक़ीः यानी इस्लाम की मुद्दते निफ़ाज की महदूद थी और यह सिर्फ एक मक़सूस मुद्दत के लिए आया था। और यह मुद्दत गुज़र जाने के बाद गुज़िश्ता आसमानी शरियतों की तरह ये भी मनसूक़ हो गया इसलिए हम वक़्त इस्लाम के निफ़ाज़ का सवाल ही नही पैदा होता।

2. इजरा करने वाले की कमी : इस्लाम की निफ़ाज़ की ज़रूरत न होने की एक वजह यह भी हो सकती है कि इस्लाम बाज़ात-ए-ख़ुद तो दायमी और क़यामत तक के लिए हो लेकिन उसमे एक बुनियादी उनसुर कम है। जिसकी वजह से इस्लाम इस वक्त क़ाबिल-ए-निफ़ाज़ नही रहा, और वह उनसुर यह है कि इस्लाम में कोई नस या इशारा मौजूद नही है जो अस्र ए मासूमीन के बाद उसके इजरा करने वाले का तअय्युन करे और इस्लाम बज़ाते खुद इस पहलू के बयान पर ख़ामोश है लिहाज़ा किसी पर इसके निफ़ाज़ की जिम्मेदारी आएद नही होती।

वुजूहात का जवाबः-
मज़कूरा दोनो वुजूहात इस्लाम के नुक्तए निगाह से बिल्कुल गलत है इस्लाम कभी ना मनसूक़ हुआ है ना कभी मनसूक़ होगा इसी तरह इस्लाम में कोई ख़ामी भी नही है जिसकी वजह से इसके निफ़ाज़ मे रूकावट पैदा हो।
इस्लाम का नाफ़िज़ करने वाला लाज़मी व ज़रूरी उनसुर इसमें हमें हर वक़्त दिखाई देता है, यह उनसुर इस्लाम में हर वक्त मौजूद था और अब भी है।
इसलिए रसूल अकरम (स.) के बाद अपने निफ़ाज़ वह इजरा का बन्दोबस्त और अपनी तशरीह व बयान का इन्तेज़ाम खु़द इस्लाम ने किया इसी तरह मासूमीन के ज़माने के बाद के लिए मज़कूरा इन्तेज़ाम खु़द इस्लाम ने किया है कभी इस्लाम के इजरा करने वाला तअय्युन मासूम की शक्ल में हुआ और कभी नायबे मासूम की शक्ल में अगर वाक़ई इस्लाम में इसे जारी करने वाला उनसुर न होता तो इसके तबाह व फ़ना होने में कोई शक व शुबह नही।
इसके अलावा इस उनसुर के न होने का तसव्वुर भी उसी वक़्त किया जा सकता है जब इस्लाम के दायमी होने का दावा हो और दूसरी जानिब उसके निफ़ाज़ करने का कोई तरीक़ा-ए-कार मौजूद ना हो तो दरहक़ीक़त यह एक किस्म का तज़ाद है जो अक़्ल की निगाह में मुहाल नज़र आता है।

(दीन ए इस्लाम काबिल ए निफ़ाज़ हैं-)
मज़कूरा फ़र्ज़ी नज़रिये के मुका़बिल एक और नज़रया मौजूद है। जिसमें इस्लाम के इजरा और निफ़ाज़ की ज़रूरत का मुस्बत जवाब मिलता है। और जो इस्लामी अहकाम की तनफ़ीज़ और उसके ज़रूरी होने का क़ायल है। लेकिन उसके निफ़ाज़ व इजरा की कई सूरते हैं वक़्त के तक़ाजो के मुताबिक उनमें से एक का हम इन्तेक़ाब कर सकते है।

1. मोैजूद हुक्मरानों के ज़रीये
यह सूरत क़ाबिल ए अमल नही है। क्यों कि मौजूदा हुक्मरान जो इस्लामी अहकाम के पाबन्द नही है। बाहुक्मे क़ुरआन ज़ालिम व जाबिर और फ़ासिक़ हैं। उन पर भरोसा करने को कुरआन ने मना किया है।
‘‘ और मुसलमानों जिन लोगो ने हमारी नाफ़रमानी करके अपने ऊपर ज़ुल्म किया है। उनकी तरफ मायल न होना वर्ना तुम तक भी दोज़ख की आग आ पलटेगी’’
सुरये हूदः आयत नं0 113

2. शूरा बैनुल मुस्लेमीन के ज़रीयेः-
शूरा अगरचे असली तौर पर इस्लाम के साबित तो है। मगर उसमें भी एक ज़रूरी उनसुर की कमी है। वह है शरायते शूरा, मसलन इस्लाम में जहां जहां शूरा का ज़िक्र हुआ है। वहां वहां शूरा के अरकान की शरायत नहीं बयान की गई है। आया तमाम मुसलमान शूरा के अरकान है?
या उनका एक गिरोह? और वह गिरोह कौन सा है? आदिल मोमिनीन? उलेमा ए इस्लाम वोकला या दानिशवरान? इसलिए यह सूरत भी क़ाबिल ए क़ुबूल नही है।

3. मुस्लमानोे का एक मक़सूस गिरोह-

आदिल मोमिनीन व वोकला के ज़रिएः-
आदिल मोमिनीन अगरचे बाज़ ज़रूरी काम अन्जाम दे सकते है लेकिन वह एक इस्लामी हुकूमत चलाने या पूरे इस्लाम से मुक्म्मल तौर पर आगाह नही होते यही हाल वोकला का है वोकला हज़रात कानून-दां तो हैं मगर इस्लाम शनास नही जो इस्लाम से वाक़िफ़ व आशना ना हों वो इसे किस तरह नाफ़िज़ कर सकते है?

4. उलेमा के ज़रियेः
इस्लाम के निफ़ाज़ की एक ही सूरत मुमकिन है और वह है उलेमा ए इस्लाम और इस्लाम शनास हज़रात के ज़रिए इस्लाम को नाफ़िज़ किया जाए क्योंकि वह इस्लाम के अहकाम व इसरार से वाक़िफ़ हैं इसी सूरत का नाम ‘‘विलायते-फ़क़ीह’’ है। उलेमा-ए-इस्लाम के ज़रिये इस्लाम का निफ़ाज़ न सिर्फ मुमकिन है बल्कि इस तरह इस्लाम से इन्हिराफ़ व कजरवि का रास्ता इख्तियार न करने की जमानत भी मिलती है।

नोटः- मौजूदा दौर में ईरान में इस विलायते फ़क़ीह के ज़रिये इस्लाम का निफ़ाज़ किया गया है। जिसने बेहद कामयाबी हासिल की है और फुक़हा ने इस निज़ाम को तक़वियत दी है और ‘‘आयतुल्लाह खामेनेई’’ मुस्लमानों के ‘‘वली-ए-फक़ीह’’ हैं। हर मुस्लमान का फ़रीज़ा है कि इस निज़ाम के बारे में जाने और निज़ाम को दूसरों तक पहुंचाए, जिस से कि दुनिया के ज़्यादा से ज़्यादा हिस्से निज़ामे इलाही के साये मे आ जाएं।
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लेखक : हुज्जत उल इस्लाम मुहम्मद हसन सलाहुद्दीन साहब(पाकिस्तान)
तरजुमा (अनुवाद) : आदिल अब्बास
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शब्दार्थ :
फ़क़ीह= इल्मे दीन जानने वाला, सही और गलत के बीच सही का इल्म हासिल करने वाला
मुफ़स्सिर= किसी बात को विस्तार से समझाने वाला
मुबैय्यन= बयान किया हुआ/गया
मज़ीद= ज़्यादा
तशरीह = अच्छे तरीक़े से बयान करना
तालेबीन = चाहने वाले, ढूंढने वाले
मुफ़स्सल = बहुत विस्तार से
रुजू= तवज्जोह
जाम-ए-शरायत= जिसमें तमाम निर्धारित शर्तें पायी जायें
अदालत = इन्साफ़
क़यादत = रहबरी, रहनुमाई, सरदारी
सलाहियत = समझ
बदरजए-अत्म = उत्तम, सबसे बेहतर
निफ़ाज़= लागू /जारी करना या होना
अदवार = कई दौर (दौर= ज़माना, वक़्त)
वुजूहात = कारणों (वजह=कारण)
मनसूक़= मिट जाना,(मनसूक़ी= मिटना)
मौज़ू= अस्ल विषय जिस के बारे में किसी इल्म में बहस की जाए
उनसुर = अस्ल बुनियाद
रेहलत= मौत, इन्तेक़ाल
इजरा = जारी करना
अरकान= ज़रूरी हिस्से
तअय्युन = मुक़रर करना, ठहराना

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