निज़ामे विलायत ए फ़क़ीह और हम

इस्लाम के सियासी निज़ाम की तबलीग़ करना हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है यह निज़ाम, निज़ामे विलायत है। विलायत सिर्फ ज़ाते इलाही की ही है और उनकी जिनको अल्लाह ने अता की हो जैसे कि मासूमीन (अ. स.) और यह मासूमीन की बताई शरायत जिसमें भी पाई जायें वह मुसलमानों का वली ए अम्र है मौजूदा दौर यानी ग़ैबत ए कुबरा में मासूमीन की बताइ शरायत के मुताबिक़ मुसलमानों के लिए वली ए अम्र आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनेई हैं।

कुछ बिके हुए मौलवी इस्लामी सियासी निज़ाम की तबलीग़ करने वालों को बहका रहे कि यह अपने मुल्क से गद्दारी करना हुआ हमें अपने मुल्क के मौजूदा निज़ाम के लिए वफ़ादार होना चाहिए।

बहुत हैरत कि बात है यह बिके हुए मौलवी और लोग सबको डरा रहे कि इस्लामी निज़ाम को ना बयान किया जाए जो कि साफ़ तौर से इस्लामी निज़ाम से फ़रार करके , ग़ैर इस्लामी निज़ाम को क़ुबूल करना है जो कि क़ुरआनी नुक्ता निगाह से ग़लत है।

साफ़ होना चाहिए कि किसी भी सियासी निज़ाम की तबलीग़ करना ग़ैर क़ानूनी नहीं होता, सबको हक़ है कि जिस सरज़मीन पर रह रहे वहाँ के लिए बेहतरीन निज़ाम की ख़्वाहिश रखे और वह निज़ाम लागू हो सके इसके लिए कोशिश करे और राह हमवार करे, इस नज़र से यह हरगिज़ भी ग़ैर क़ानूनी नही है बल्कि अपने मुल्क के लिए बेहतरीन सियासी निज़ाम की कोशिश मुल्क से सच्ची वफादारी है क्योंकि सबसे बेहतरीन निज़ाम ही, हर गिरोह के लोगो को इन्साफ़ दिला सकता है।

मुसलमानों के लिए किसी मुल्क का वफादार होना जरूरी नहीं है बल्कि इस्लाम यह सिखाता है कि वफादारी सिर्फ अल्लाह से करना है और यह इतनी खूबसूरत बात है कि जो इन्सान अल्लाह का वफ़ादार होगा वह उसके कानूनों पर अमल करेगा और उनको दुनिया में लागू करने की कोशिश करेगा।

निज़ामे विलायत इलाही निज़ाम है और इसकी तबलीग़ दीनी फ़रीज़ा है क्योंकि इसी निज़ाम से इन्साफ़ क़ायम किया जा सकता है और किसी भी मुल्क में इसकी तबलीग़ ग़ैर क़ानूनी नहीं हो सकती क्योंकि यह पाॅलिटिकल साइंस के अन्दर आता है और हर साहिब ए इल्म व फ़िक्र को अपनी सरजमीं के लिए बेहतरीन निज़ाम के लिए कोशिश करना चाहिए जिससे कि उसकी सरजमीं (मुल्क) में अम्न व इन्साफ़ की हुकूमत क़ायम हो जो कि मकतबे इस्लाम के मुताबिक़ निज़ामे विलायत है जिसमें हाकिम इमामे मासूम होगा और अगर इमाम ग़ैबत में हो या हाज़िर ना हो तो वह फ़क़ीह(आलिम दीन) जो इलाही क़वानीन बेहतर जानता हो, गुनाह ना करता हो, दूरनदेश हो, बहादुर हो, इन्साफ़ पसन्द हो।

निज़ामे विलायत में एक वक़्त में पूरी दुनिया का एक ही हाकिम होगा जिससे कि इख्तिलाफ़ का डर खत्म हो जाता है बाक़ी हर अलग सरज़मीं पर उसी एक हाकिम के नुमाइंदे हुकूमत करेंगे।

मौजूदा दौर में निज़ाम ए विलायत की मिसाल इरान है और विलायत फ़क़ीह आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनेई को अता है क्योंकि उनमें ऊपर ज़िक्र हुई तमाम ख़ुसूसियात हैं जो एक हाकिम में होना चाहिए, जिसकी जीती जागती मिसाल उनकी जिंदगी है।

ऐसे मे इस निज़ाम के बारे में लोगों को ना बताना ग़लत है और जो लोग बता रहे उनको रोकना उस से भी ज़्यादा ग़लत है और इस निज़ाम को बयान करने वालों को देश द्रोही कहना संगीन जुर्म है ऐसा एक जाहिल आदमी ही कर सकता है या फिर वह जो इस निज़ाम का दुश्मन हो जो नही चाहता हो कि निज़ामे विलायत दुनिया में क़ायम हो।

एक बात आखिर में बताना ज़रूरी है वह यह कि निज़ामे विलायत भले ही इस्लामी निज़ाम है लेकिन इसमें हर मज़हब के इन्सान को अमान है उसको उसके मज़हब पर अमल की आज़ादी है यह बात सिर्फ इसलिए लिखना पड़ी क्योंकि कुछ जाहिल व दुश्मन ए इस्लाम के हाथों बिके लोगों ने इस्लाम को एक तकफ़ीरी दीन की तरह पेश किया जबकि इस्लाम पूरी दुनिया के लिए अमन का तलबगार है चाहे इन्सान किसी भी मज़हब, रंग, जाती का हो। हक़ीक़ी इस्लाम वह नही जो तालिबान, अल-कायदा जैसे आतंकी गिरोह बयान करते हैं यह गिरोह जाहिल व गुमराह लोगों से भरे पड़े हैं इनके बनाने वाले दुशमने इस्लाम हैं जिन्होंने लोगों को इस्लाम से दूर करने के लिए यह गिरोह बनाये जो बेकसूर लोगों के गले काटते हैं इस्लाम के नाम पर, जबकि इनका दूर दूर तक इस्लाम से कोई रिश्ता नहीं है।

इस्लाम ने मुआशरे में इन्साफ़ की बुनियाद रखी है जिसके लिये एक निज़ाम दिया है जिसका नाम विलायत है, विलायत यानी सरपरसती सिर्फ अल्लाह का हक़ है और अल्लाह ने यह हक़ अपने भेजे गए बन्दों मे से कुछ को दिया है जो बारह मासूमीन हैं और इनकी ग़ैर हाज़री में यह विलायत उस फ़क़ीह को हासिल है जो वह अच्छी खूबियों का मालिक हो जिन्हे पहले बयान किया जा चुका है इसी को “विलायत ए फ़क़ीह” कहते हैं और जिस फ़क़ीह को यह विलायत हासिल हो वह “वली ए फ़क़ीह, वली ए अम्र” कहलाता है। इस वक़्त “वली ए फ़क़ीह आयतुल्लाह अल उज़मा सैय्यद अली ख़ामेनेई ” हैं।
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लेखक: आदिल अब्बास

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